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मयंक के लिए शुभांगी का पत्र -

हैलो! कैसे हो मयंक? उम्मीद है अच्छे होगे।
एक बात बताओ, क्या तुम अब भी मुझे याद करते हो? ह ह...कभी-कभी तो याद आ ही जाती होगी।अब मुझे तुम्हारी याद नहीं आती...जादा। हाँ,शुरुआत में मैं एकदम से परेशान हो गई थी। बहुत रोयी थी मैं। शायद इतना पहले कभी नहीं रोयी थी। तुम्हें याद है? कैसे मैं तुम्हारी बातें सुन जोर से हँस उठती थी। कभी-कभी जब मैं बहुत उदास हो जाती थी, एक तुम ही थे जो मेरे मूड को एक सेकंड में ठीक करना जानते थे।जानते हो? वो पल मेरी ज़िंदगी के सबसे हसीन पल थे जो मैंने तुम्हारे साथ बिताए थे। तुम्हें याद है वो दिन जब मैं तुमसे पहली बार मिली थी? तुम मुझे कब से नोटिस किये जा रहे थे और मैं अपनी फ्रेंड्स के साथ एकदम मस्त थी और फिर जब वो लड़का तुमसे जाकर टकराया, तब जाके मैंने तुम्हें देखा था। तुम कैसे एकदम से लजा से गए थे मुझे अपनी ओर देखता पाकर!आसमानी शर्ट और काले पैंट में तुम एकदम गजनी वाले आमिर खान लग रहे थे। न जाने तुम्हें कैसे पता था कि मेरा पसंदीदा रंग आसमानी है या शायद उस दिन से मेरा पसंदीदा रंग आसमानी हो गया। बहुत अच्छे लगे थे तुम मुझे, एकदम क्यूट से। तुम्हें देखते ही पहली नज़र का प्यार हो गया था तुमसे। कहीं ना कहीं इसमें मौसम का भी हाथ था। सूरज ढलने को आया था, ऊपर से मौसम एकदम रोमैन्टिक सा था और फिर तुम मेरे पास आकर बोले थे, “हाय! दिस इज मयंक...मयंक मिश्रा” और फिर हमारा पहली बार सामना हुआ था एक-दूसरे से। उसी दिन तुम मेरे सबसे अच्छे वाले दोस्त बन गए थे। हम कैसे घण्टों एक दूसरे से बातें करते थे! ढलते सूरज को देखना बहुत पसंद था न तुम्हें!
      
        तुम्हें पता है? मुझे लगता है कि काला रंग मेरा ‘अनलकी कलर’ है मगर मेरे पूछने पर तुमने अपना पसंदीदा रंग ‘ब्लैक’ बताया था तब मैंने पहली बार अपने ‘अनलकी’ रंग का सूट खरीदा था...मगर अफसोस इससे पहले कि मैं उसे पहनती तुम चले गए मेरी ज़िंदगी से... दूर... बहुत दूर...इतना कि अब याद भी नहीं आते...जादा। शायद सच में काला रंग मेरे लिए ‘अनलकी’ है।तुम जब मुझे शुभी कहकर बुलाते थे ना...मुझे बहुत अच्छा लगता था। तुम्हें ग़ज़लों का बहुत शौक था न! पहले मैं ग़ज़लें नहीं सुनती थी या यूँ कहो बहुत कम सुनती थी पर अब तो दिन ही पूरा नहीं होता इनके बिना। जानते हो? तुम्हारी पसंदीदा ग़ज़ल आज भी मेरी हैलो ट्यून है..ह ह। तुम्हारी संगत में ‘मैं’ भी ‘तुम’ बन गई...

        मुझे एक बात का अब तक पछतावा है कि मैंने आखिर तुमसे अपने दिल की बात क्यों कह दी थी। शायद मुझे लगा था कि यह जानकर तुम भी मुझे उतना ही चाहने लग जाओगे जितना कि मैं तुम्हें...। मैं स्वार्थी हो गई थी शायद...मुझे लगा कि ऐसे मैं तुम्हें पा लूँगी...तुमसे यह कह देना मेरी सबसे बड़ी भूल थी। मैंने यह बात कहकर तुम्हारी दोस्ती भी खो दी। मैं भूल गई थी कि हमारी जाति अलग है, मैं भूल गई थी कि यह समाज हमारे रिश्ते को स्वीकार नहीं करेगा, मैं भूल गई थी कि हमारा परिवार स्वीकार नहीं करेगा...इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।हमने दोस्ती तो कर ली थी मगर प्यार करने से पहले हमें एक-दूसरे कि जाति जान लेनी चाहिए थी... है न? तुम मुझसे कहते थे न “प्यार में कोई शर्त नहीं होनी चाहिए!” मान ली मैंने तुम्हारी बात, क्या हुआ जो तुम मेरे न हो सके, मैं फिर भी तुमको चाहूँगी! अगर फिर जनम मिले तो एक बार फिरसे मैं तुम्हारी दोस्त बनना चाहूँगी... चंद दिनों के लिए ही सही...
    
       मुझे लगता है कि जिसे हम चाहते हों उससे अगर हम अपने दिल की बात कह दें तो काफी हद तक आशंका है कि हम उसकी निश्छल दोस्ती भी खो दें। यही क्या कम है कि हमारे पास एक सबसे अच्छा दोस्त है जो हमें हमसे अधिक समझता हो। मुझे लगता है इस दुनिया में दोस्ती से निःस्वार्थ कोई रिश्ता नहीं है जिसमें अजनबी होते हुए भी कोई शख्स हमारे सबसे करीब हो जाता है, एक-दूसरे की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर....

         अगर मुझे एक दिन के लिए ‘डिवाइन पॉवर’ मिल जाए तो मैं अपनी ज़िन्दगी के वही पल ‘डिलीट’ करूँगी जब मैंने तुमसे अपने दिल की बात कहने की भूल की थी। किसी ने सही ही कहा है-

एक गफ़लत सी बनी रहने दो हर रिश्ते में...
किसी को इतना न जानो कि जुद़ा हो जाये !

काश मैंने यह पहले ही समझ लिया होता!

तुम बहुत अच्छे हो...जहाँ भी हो खुश रहो यही दुआ रहेगी...
तुम्हारी एक बात जो मुझे सबसे अच्छी लगती थी...जो तुम सबका सम्मान करते थे,जो तुम कभी किसी लड़की से बात नहीं करते थे, कभी किसी का भी दिल नहीं दुखाते थे (मैं अपवाद थी शायद ),जब भी मैं निराश हो जाती तो तुम कैसे मुझे समझाते थे...जब एक बार मुझे अपने पर ही शक होने लगा था तब तुमने मुझसे कहा था “एक बिन्दी से लाइन बनती है, ये याद रखना शुभी”...देखा?तुम्हारी ये बात अब तक याद है मुझे...वो जो तुम मेरी बड़बड़ को इतने इंटरेस्ट से सुनते थे, पता नहीं कैसे झेलते थे तुम...ह ह

मैं हमेशा कहती थी न तुम सबसे अच्छे हो..सबसे अच्छे.. हाँ, तुम सच में सबसे अच्छे हो...तुम्हारे जैसा कभी कोई हो ही नहीं सकता।
मैं आज भी तुम्हारा उतना ही सम्मान करती हूँ... उतना ही प्यार करती हूँ तुमसे......
और हमेशा करती रहूँगी...निःस्वार्थ...
तुम हमेशा मुझसे कहते थे न कि “शुभी! तुम हँसते हुए बहुत अच्छी लगती हो” जानते हो?
तब से मैं हमेशा खुश रहती हूँ, हमेशा हँसती रहती हूँ...और एक रिक्वेस्ट है मेरी जाते-जाते...
प्रॉमिस करो कि तुम भी हमेशा खुश रहोगे,हँसते रहोगे...मेरी ही तरह...जो हुआ उसके लिए खुद को कभी दोष मत देना... इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है न! तुम तो मेरे हीरो हो। मुझे पता है तुम आज भी मुझसे उतना ही प्यार करते हो। तुम सबसे अच्छे हो,सबसे अच्छे...खुश रहना हमेशा... मुझसे भी जादा...

(...मुझे खबर थी, वो मेरा नहीं पराया था...पर धड़कनों ने उसी को खुदा बनाया था...मुझे ख़बर थी, वो...)
  
                                                         
                                                         तुम्हारी शुभी

- सुप्रिया दूबे ©