तुम दूर हो

तुम दूर हो
तुमने जो कुछ भी बताया
मैंने उसकी कल्पना की
तुमने मुझे कल्पनाशील बनाया
कल को अगर मैं कविताएँ लिखने लगूँ
तो इसमें सबसे बड़ा योगदान तुम्हारा होगा। 

- सुप्रिया 🌸

[२६/२/२०२१]



सर्दी की एक शाम

बाईस जनवरी दो हजार इक्कीस। शाम का समय है। गोधूलि बेला होने में अभी थोड़ा समय शेष है। पढ़ाई के दबाव तले छत पर क़िताब लेकर ठीक वैसे ही टहल रही हूँ जैसे किसी अजायबघर में क़ैद कोई शेर गुस्से में इधर से उधर टहलता है, बस फर्क यह है कि मैं इंसान हूँ, गुस्से में नहीं हूँ और धीरे-धीरे टहल रही हूँ। 

अचानक पढ़ाई से ध्यान भटकता है और नज़र प्रकृति के माथे पर लगी उस लाल बिन्दी पर जाती है जो अपनी जगह से पल-पल खिसक रही है। आकाश की लाली को देखकर लगता है कि कोई नई नवेली दुल्हन विवाह पश्चात की प्रथम रात्रि के विषय में थोड़ी उत्साहित है किंतु शर्म उसके गालों को लाल किये दे रही है। पक्षियों का एक झुण्ड अपने आशियानों की ओर उन्मुक्त उड़ा चला जा रहा है। यह नववधू का मन लग रहा है, जो विवाहोपरांत भी स्वतंत्रता की आशा कर रहा है। उसे यकीन है उसका साथी उसके सपने देखने पर प्रतिबन्ध नहीं लगाएगा।

अचानक मुझे याद आता है कि कहीं बहते हुए कोई नदी सागर में मिल रही होगी। मगर उसका मिलना अनवरत होगा। उन दोनों की प्यास कभी नहीं बुझेगी। कितनी सुंदर लग रही है यह कल्पना! लेकिन यह क्या!? यह शोर कैसा! ध्यान जाता है उस ओर जहाँ निर्माणाधीन एक इमारत की छत बन रही है। उफ़्फ़! एक भयानक सन्नाटा है इस शोर में। वैज्ञानिकता का शोर कितना वीभत्स होता है!

शोर से ध्यान हटाने की कोशिश करती हूँ। देखने लगती हूँ अपने हाथों को। कितने साँवले पड़ गए हैं और पहले से काफी ऊरठ  गए हैं। आज कितने दिनों बाद ध्यान गया इनपर। नाख़ून भी लम्बे हो गए हैं, काटने हैं। पैरों को देखती हूँ। वह लाल नेलपॉलिश जो महीने भर पहले लगाई थी, अब कहीं-कहीं छूट चुकी है।

नज़र ऊपर उठाती हूँ। सामने के एक अन्य निर्माणाधीन दो मंज़िली इमारत पर एक मजदूर खड़ा है। थोड़ी और दूर देखती हूँ तो एक बड़ा सा टॉवर दीखता है। वह पास की इस इमारत से बड़ा है। कुछ चिड़ियाँ उड़-उड़कर उसपर बैठ रही हैं। तभी नज़र उस ओर जाती है जहाँ थोड़ी देर पहले लाल बिन्दी दीख रही थी। अब नहीं दीख रही है। शायद प्रकृति ने घूँघट कर लिया। 

गोधूलि बेला हो गई है और यही सोचकर मैंने क़िताब बन्द कर दी है और दौड़ पड़ी हूँ पेपर और पेन की तलाश में...

- सुप्रिया

(तस्वीर दो महीने पहले की है)



आकर्षण

 तुम, जो हो

वही दिखना चाहते हो

तुम में, नहीं है-

बनावट

अभद्रता

दिखावट

तुम्हारी सकारात्मकता

मुझे आकर्षित करती है।


- सुप्रिया 🌸


 [१८/१२/२०२०]



कसप (समीक्षा)

आज ५ दिनों के पठन के बाद मैंने ‘कसप’ को जैसा पाया ठीक वैसी ही राय थी मेरी इसके विषय में इसे पढ़ने से पहले। और यही कारण रहा जब भी कोई मुझसे किताबें सुझाने को कहता मैं ‘कसप’ का नाम जरूर लेती। ‘कसप’ से मेरा पहला परिचय कब हुआ था मुझे ठीक से याद नहीं, शायद जब प्रभात रंजन जी की ‘पालतू बोहेमियन’ में पढ़ा था मैंने इसका नाम या शायद जब फेसबुक पर सत्य व्यास ने सुझाया था इस किताब को। इसे पढ़ने से पहले मैंने इस क़िताब पर बहुत कुछ पढ़-सुन रखा था। मैं इसे पढ़ने से पहले से ही बेबी-डी डी को जानती थी। मैं जानती थी यह पहाड़ी पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास है। मैं जानती थी इसमें कुमाऊँनी शब्दों का भरपूर प्रयोग हुआ है। मैं जानती थी कि इसे जोशी जी ने महज ४० दिनों में लिखा था। और जब से मैंने यह जाना था, यह क़िताब मेरी टी.बी.आर. लिस्ट में ऐड हो गई थी। और यह ठहरी एक प्रेम कहानी तो वैसे भी मुझसे जादे दिन बचने वाली थी नहीं।

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जैसा कि क़िताब का शीर्षक है - ‘कसप’ यानी ‘क्या जाने’। मैं इस क़िताब के विषय में कुछ कहकर इसके शीर्षक को झुठलाना नहीं चाहती और न मैं कुछ कह ही पाऊँगी। हाँ इतना कहूँगी कि क़िताब के शुरुआत में लेखक की शैली और कुमाऊँनी शब्दों का प्रयोग मुझे थोड़ा अटपटा सा लगा, लेकिन फिर मैं उसकी अभ्यस्त हो चली। लेखक ख़ुद इस कहानी को सुनाता है और जिस तरह वैदिक मन्त्रादि का उल्लेख हुआ है इससे लगता है लेखक काफी विद्वान है और क़िताब के पीछे छपी उनकी छोटी सी तस्वीर में धीर गंभीर चेहरे पर चश्मा लगाए काले घेरे लिए हुए थकी-थकी हुई आँखों से लगता भी है। मैं इस क़िताब के हर दो पन्ने पढ़ने के बाद क़िताब के आखिरी पृष्ठ पर छपी उस धीर गंभीर तस्वीर में अध्ययन करते-करते थक चुकी सी आँखों को देखते हुए यही सोच रही थी कि मैं बियाह करूँगी तो किसी ऐसी ही पढ़ी-पढ़ी सी थक चुकी आँखों वाले से, हालाँकि वो मेरा हमउम्र होगा। लाज़िम ही है ऐसी रसभरी क़िताब पढ़ते हुए ऐसे उलूल-जुलूल से ख़याल पाठक के मन में आ जाएँ। देखते हैं अपनी कहानी कहाँ शुरू होती है। गुसलखाने से तो नहीं ही शुरू होगी, उम्मीद है।

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अब यह क़िताब तो पूरी हुई। लेकिन मेरे लिए एक समस्या आ ठहरी कि अब मैं जो भी वाक्य बोल रही उसके अंत में ‘ठहरा’, ‘ठहरी’ और ‘बल’ जैसे शब्द बोलने से ख़ुद को मुश्किल से रोक पा रही। कुछ दिन तो इसका असर रहना ही है।

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~ सुप्रिया दुबे 🌸

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#kasap #manoharshyamjoshi #lovestory #novel #bookstagram #indianbookstagram



Independence Day 2020

 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हो गया। देश का पुरुष वर्ग आज़ाद हो गया लेकिन देश की महिलाएँ, लड़कियाँ आज भी इक कैद में हैं, वे मजबूर हैं घरों में रहने के लिये। और उनकी इस कैद का ज़िम्मेदार है यह समाज। सबसे पहले तो खुद उनके ही घरवाले। जिनमें से कुछ तो बाहरी दुनिया को बेटियों के लिए असुरक्षित मानते हुए मजबूर हैं और कुछ रूढ़िवादिता से ग्रसित होने के कारण 'गैर जिम्मेदार' हैं। हमने एक ऐसा समाज बना दिया है जिसमें लड़कियों के मन में असुरक्षा का डर बैठ गया है। 


आज कोविड-19 नामक वैश्विक महामारी के चलते पुरुष वर्ग भी महीनों से घरों में कैद है, यही समय है महसूस करने का कि कैसा लगता है लड़कियों को कैद में रहते हुए। आप तो 5 महीनों में ही उकता गए। 


अब जरूरत है कि देश का हर पुरुष गुंजन सक्सेना जी के पिता की तरह सोचे, और अपने देश की बेटियों को “पिंजरा तोड़ के उड़ जाने” के लिए प्रेरित करे। जिस दिन यह समाज बेटियों को एक सुरक्षित परिवेश दे सकेगा, बेटियाँ आज़ाद होंगी, और सही मायने में तब जाकर हमारा पूरा देश आज़ाद होगा। जब तक देश का एक भी वर्ग कैद में है, हम देश को आज़ाद नहीं कह सकते।


~ सुप्रिया दुबे 🌸


#IndependenceDay2020

#GunjanSaxena


[ In frame - Flight Lieutenant Miss Gunjan Saxena, the only woman who served the country in The Kargil War, with her father, Mr. Anup Saxena ]



मुझे माफ़ करना मेरे दिल!

जानते हो? जब मैं तुमसे बात करती हूँ, मुझे लगता है मैं स्त्री हूँ, ख़ूबसूरत हूँ। कई-कई दिनों तक जब तुमसे बात नहीं होती, मेरे अंदर पुरुषों की सी रुखाई आ जाती है। मुझे अपने लम्बे बाल छोटे-छोटे, बॉयकट से लगने लगते हैं। मुझे लगता है, मेरी आवाज भारी होती जा रही है। 


हाँ, यह सच है, अब तुम मुझे पहले जितने पसन्द नहीं रहे। न जाने क्यूँ, मुझे तुमसे एक चिढ़न सी होती है अब, लेकिन मैं आज भी तुमसे प्रेम करती हूँ। सच है, मैं न चाहते हुए भी तुमसे प्रेम करती हूँ। न चाहते हुए भी तुम मेरे सपने में अक्सर आ जाते हो। और जैसे हम दोनों असल जिंदगी में दो ध्रुवों की भाँति दूर-दूर हैं, सपने में भी दूर होते हैं। आज भी जब मैं अरिजीत के गाने सुनती हूँ। बस तुम्हें ही महसूस कर पाती हूँ। 


लोग कहते हैं "प्यार इंसान को मजबूत बनाता है", लेकिन मेरे साथ उलट हो रहा है। मैं तुम्हारे प्यार में खुद को कमजोर महसूस कर रही हूँ। यह जानते हुए भी कि मुझे तुम्हारा प्यार कभी नहीं मिलेगा, मैं तुमसे प्यार किये जा रही हूँ। मुझे डर है, क्या मैं सहन कर सकूँगी तुम्हें किसी और का होता हुआ देखकर? जब कि मुझे पता है, एक दिन निश्चित रूप में ऐसा होना है। मैं तुम्हें बाँध नहीं सकती, तुम स्वतंत्र हो।


धीरे-धीरे मुझे समझ आ रहा है कि तुम्हारी पसन्द मेरी पसन्द से अलग होती जा रही है। एक समय था, जब हमें लगता था कि हम एक-दूसरे की परछाईं हैं, लेकिन यह सारी बातें आज मिथ्या साबित हो रही हैं। अब मुझे तुममें नकारात्मकता दिखाई पड़ती है और मैं ठहरी सकारात्मकता की पुजारिन, हमारा मेल हो भी गया तो शायद सारी उमर लड़ते ही बीते। नहीं मैं तुम्हारे लिए ठीक लड़की नहीं हूँ। मैं शायद तुम्हें वह सब न दे सकूँगी जो तुम्हें मिलना चाहिए। मैं तुम्हारे साथ खुश रह भी लूँ मगर तुम मेरे साथ खुश न रह सकोगे। और मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर खुश देखना चाहती हूँ।


मैं बहुत कोशिश करती हूँ कि तुमसे दूर हो जाऊँ। तुमसे बात करना कम कर दूँ। इसीलिए मैं कभी बात करने की पहल नहीं करती। मगर कई दिनों बाद जब तुम्हारा msg आता है, तुम पूछते हो - "कहाँ गायब हो?", मैं जवाब दिए बिना रह नहीं पाती। फिर हमारी बातें लम्बी होती जाती हैं। मैं भूल जाती हूँ मुझे तुमसे दूर रहना था। 


तुम आज भी मुझे हँसाने की कोशिश करते हो, मगर आज मैं पहले की तरह हँस नहीं पाती। पहले तुम किसी और लड़की से बतियाते थे, मुझे जलन नहीं होती थी। मगर आज जब निश्चित है कि तुम किसी और के हो जाओगे। मुझे उनसे जलन होती है। मगर तुम तो अपनी आदत से मजबूर किसी से भी हँसी-मजाक करने लगते हो। तुम क्या जानो कैसा लगता है! तुम्हें तो कभी किसी से प्रेम हुआ ही नहीं। हुआ भी तो अजीबों गरीब चीजों से। बकरी के छोटे बच्चों से, किसी के पैरों की पायल से, हरे खेत-खलिहानों से। कैसे पागल हो तुम! कभी-कभी खुद को कोसती हूँ, मैं क्यों लड़की जन्मी! क्यों न हो गई किसी के पैरों की पायल! 


इस जनम में हमारा मेल नहीं होना है। विधाता लिख भी दें तो मैं होने नहीं दूँगी। हाँ भले ही मेरे हिस्से में महज़ तुम्हारी यादें आएँगी। तुम्हें जैसी सजी-सँवरी, नाजुक सी लड़कियाँ पसन्द आती हैं, मुझे पता है मैं उनके जैसी नहीं हूँ। और न ही मैं तुम एक के लिए ख़ुद को बदल सकती हूँ। तुम भले ही मुझसे प्यार नहीं करते, लेकिन मैं तुम्हारे साथ ही साथ खुद से भी बहुत प्यार करती हूँ। तुम एक का प्यार पाने के लिए मैं जीवन भर झूठा नाटक नहीं कर सकूँगी। मैं बहुत ही बेकार अभिनेत्री हूँ। मेरा भेद सामने आ ही जाएगा एक दिन। और फिर ख़ुद को बदलकर मैं भले ही तुम्हारा प्यार पा लूँ, मैं अपना प्यार खो दूँगी अपने लिए। और मैं जैसी हूँ, अगर वैसी ही रह गई तो निश्चित ही एक दिन अपने निर्धारित लक्ष्य को पा लूँगी। मुझे समाज की भलाई के लिए करनी होगी - झुमका, बिंदिया, पायल की कुर्बानी। मुझे माफ़ करना मेरे दिल, मैं तुम्हारी काम न आ सकूँगी।


नोट - उपरोक्त सभी बातें काल्पनिक हैं।


~ सुप्रिया दुबे 🌸



मुझे किताबों का शौक कैसे लगा

हमारे स्कूल 'सरस्वती शिशु मंदिर' की छत छप्पर की बनी हुई थी। जैसा कि बारिश होने पर उसके टूटे-फूटे हिस्से से पानी टपकता था, उस दिन भी टपक रहा था। उसी दिन हमारे स्कूल में निरीक्षक आने वाले थे, पठन-पाठन की निगरानी करने। वे आये। उन्होंने बहुत सी बातें कही होंगी, मगर उनकी जो बात मुझे आजतक याद रह गई, वह थी - “किताबें हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं।” उस दिन मुझे यह वाक्य कुछ तर्कसंगत नहीं जान पड़ा। इसलिए भी क्योंकि उस वक़्त मेरे लिए किताबों का मतलब सिर्फ टेक्स्ट बुक से था जो कि हमें जबरन पढ़ाई जाती थीं। उस समय मैं कक्षा प्रथम में थी।

समय गुज़रा, अब हिंदी की टेक्स्ट बुक में मजेदार कहानियाँ पढ़ने को मिलने लगीं। इसके अलावा दीदी-भईया को बाल पत्रिकाओं का शौक होने के नाते घर के किसी कोने में चंपक, बालहंस, नन्हे सम्राट जैसी पत्रिकाएंँ पड़ी ही रहती थीं। ऐसे ही किसी दिन एक पत्रिका मेरे हाथ लगी। मैंने उसे पढ़ा। मुझे मजा आने लगा। फिर मैं घर में उपलब्ध सभी पत्रिकाएँ खोज-खोजकर पढ़ने लगी। 

दूसरी-तीसरी कक्षा में आते-आते ये शौक जाता रहा। परीक्षाओं और भारी बस्ते के बोझ तले यह शौक कब दम तोड़ दिया, पता ही नहीं चला। अब मेरा सारा ध्यान केवल स्कूली पढ़ाई में केंद्रित हो गया।

फिर जब मैं 9 वीं कक्षा में आयी। मुझे हिंदी की टेक्स्ट बुक में ‘मन्त्र’ कहानी पढ़ने को मिली। इसने मेरे मर चुके शौक को दोबारा ज़िंदा कर दिया। मेरी प्रेमचंद में रुचि बढ़ी। फिर घर में एक दिन मेरे हाथ ‘ग़बन’ लगी। यह पहला उपन्यास रहा जिसे मैंने पढ़ा और पूरा पढ़ा। फिर घर में मौजूद जितने भी दो-चार उपन्यास थे जैसे - सेवासदन, निरुपमा, हॉफ गर्लफ्रैंड मैंने सारे पढ़ डाले।

इनको पढ़ते-पढ़ते मैं 12 वीं में पहुँच गई। और 12 वीं के आख़िर में मुझे मिला- एंड्रॉइड फ़ोन। यहाँ से मेरे अंदर का बुकवार्म बड़ा और बड़ा होता गया। मैं इस बीच टूटी-फूटी कुछ लाइनें भी लिखने लगी थी। एक दिन भईया ने मुझे सुझाव दिया कि मैं फेसबुक पर एकाउंट बनाऊँ और पढ़ने-लिखने वाले लोगों से जुड़ूँ, जिनमें से कुछ के नाम भी बताए उन्होंने। मैं उनसे जुड़ी। अब मैं उनको पढ़ने के साथ-साथ अपना लिखा शेयर करने लगी। और इस तरह मेरे कई सारे पढ़ने-लिखने वाले दोस्त बनते गए। उनकी संगत में आने पर मुझे पता चला कि मैंने कितना कम पढ़ा है। जब वे अपने बुकशेल्फ की तस्वीरें साझा करते तो मैं उनके बुकशेल्फ से अपने छोटे से किताबों के ढेर की तुलना करती। और इसी प्रतिद्वंद्विता के चक्कर में मेरे किताबों के ढेर में एक-एक कर किताबें जुड़ती जा रही हैं। मैंने यहाँ बहुत कुछ सीखा। नए उभरते लेखकों के बारे में पता चला। इससे पहले मैं हिंदी को प्रेमचन्द, निराला, जयशंकर प्रसाद जैसे पुराने लेखकों तक ही सीमित समझती थी। मुझे लगता था कि अब हिन्दी में लिखने वाले लेखक नहीं रहे। अब हिंदी में उपन्यास नहीं लिखे जाते। मगर यहाँ आकर मेरी सोच बदली। मैं ‘नई वाली हिंदी’ से वाक़िफ़ हुई। मैंने इसके अंतर्गत लिखने वालों को पढ़ा। मेरे सोचने का दायरा बढ़ा। बहुत सी अच्छी आदतें डेवलप हुईं। ‘कविता कोश’ और ‘गद्य कोश’ जैसी वेबसाइट के बारे में पता चला। मैं वहाँ भी कुछ न कुछ पढ़ लेती हूँ। हालाँकि मैं स्क्रीन पे पढ़ने में उतना सहज महसूस नहीं करती। मैं पेपरबैक्स ही पढ़ती हूँ। 

ऐसे ही एक दिन यूट्यूब पर किसी क़िताब का रिव्यु सर्च करते वक़्त Helly नाम की एक Booktuber का एक Bookish वीडियो दिखा। मैंने उसके चैनल को Subscribe कर लिया। वहाँ मुझे किताबों से सम्बंधित वीडियोज देखने को मिलने लगे। हालाँकि वो इंग्लिश में वीडियो बनाती है फिर भी बहुत कुछ सीखने को मिला उससे। उसी का एक fb ग्रुप है ‘Helly Book Club’ नाम से। मैं उस क्लब की मेम्बर बनी तो वहाँ से बहुत से पढ़ाकू दोस्त बन गए मेरे। जिनसे बुक recommendations मिलते रहते हैं। मैं उनके साथ रीडिंग स्पीड भी compare करती हूँ। और इस तरह पहले से अब में काफी सुधार हो गया है मेरे पढ़ने की स्पीड में।

किताबें मुझे कभी भी अकेला महसूस नहीं होने देतीं। जब भी मुझे किसी विषय में मार्गदर्शन की जरूरत होती है, वे मेरी गुरु बन जाती हैं। जब भी मैं अकेली होती हूँ, वो मेरी दोस्त बनकर मुझसे बतियाती हैं। और यही कारण है कि इस लम्बे लॉकडाउन के दौरान भी मैं ऊबने से बच गई। आज मुझे निरीक्षक महोदय की बात याद आती है, उन्होंने ठीक ही कहा था। अब तो भीड़ में तन्हाई में, प्यास की गहराई में, मुझे किताबें ही याद आती हैं। 

जब भी कभी कोई मुझे किताबें गिफ्ट करता है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। मैंने तो अपने दोस्तों से कह रखा है कि जब भी मेरे जन्मदिन पर मुझे कुछ देना हो तो किताब ही देना और वो भी मेरी पसंद की। कुछ दोस्तों से मुझे किताबें मिली भी हैं। जिन्हें मैं बहुत सँभालकर रखती हूँ। मुझे लगता है कि यदि आप चाहते हों कि कोई शख़्स आपको बार-बार याद करे तो उसे एक क़िताब गिफ्ट कर देनी चाहिए। ऐसे में जब भी वह उस किताब को पढ़ेगा या अपनी किताबों को Arrange करेगा, उसे आपकी याद आएगी। वो आपको कभी नहीं भूल पाएगा। और लगे हाथ उसका भी कल्याण होगा।

पता है? मुझे जब भी किसी लम्बी यात्रा पर जाना होता है, मैं अपने साथ कोई किताब जरूर ले जाती हूँ।  यहाँ तक कि अगर शादी जैसे व्यस्त माहौल में भी जाना होता है तब भी।  ये बात और है कि वहाँ पढ़ने का माहौल न मिलने से किताब जस की तस वापस लौट आती है फिर भी मैं उन्हें साथ रखती हूँ, मुझे उनका साथ अच्छा लगता है। 

इसी साल फरवरी महीने में मेरा एक शादी में पहली बार लखनऊ जाना हुआ। मैं वहाँ शादी के दिन से 2-3 दिन पहले पहुँची थी। वहाँ रस्मों से समय निकालकर मैं हजरतगंज स्थित यूनिवर्सल बुकस्टोर पहुँची। मैंने वहाँ 2-3 घण्टे बिता दिए, महज किताबों को निहारने में। फिर अपनी लिस्ट में लिखी किताबें खरीदीं और वापस लौट आई। यह मेरी ज़िंदगी का एक यादगार दिन रहा। वहाँ पहुँचकर मुझे अपने शहर में एक ऐसे बुकस्टोर की कमी खली। मैंने तय किया कि कुछ समय बाद मैं अपने शहर में भी एक छोटा ही सही पुस्तकालय खुलवाऊँगी ताकि आने वाली पीढ़ी को अमेज़न से क़िताब न मँगाना पड़े, उनको हफ़्ते भर किताब के आने का इंतज़ार न करना पड़े और उनका डिलीवरी चार्ज भी बचे।

मैंने अभी अपनी किताबों को फर्श पर ही अखबार बिछाकर तह किया है। जिनमें हर हफ़्ते नई किताबें जुड़ती जा रही हैं। अब किताबों को एक बुकशेल्फ की शख़्त जरूरत है। लॉकडाउन से उबरने के बाद सबसे पहला काम जो मैं करूँगी, वह है- एक बुकशेल्फ बनवाना। मैं तख़्त पे सोऊँ और मेरी किताबें ज़मीन पर पड़ी रहें, मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता।

Supriyaa Dubeyy  ✨


हाथ थाम लेना

कई बार
बेहतरीन की तलाश में
हम गँवा देते हैं 
बेहतर का भी साथ 

और जिस बेहतरीन की तलाश होती है हमें
वो बेहतरीन
हमें कभी नहीं मिलता

जो भी मिलता है
उसमें रहती हैं कमियाँ 

जो तुम्हें थोड़ा सा भी समझता हो
करता हो तुम्हारी थोड़ी सी ही फ़िक्र
उसे जाने न देना
हाथ थाम लेना!

○○○🌸○○○

सुप्रिया दुबे

[ Painting - Two Human Beings. The Lonely Ones by Edvard Munch]


कुढ़न (समीक्षा)

‘कुढ़न’ की आख़िरी कविता पढ़ी आज मैंने। इस कविता-संग्रह को पढ़ते हुए कभी संयोग शृंगार का रस मिलता है, कभी वियोग का तो कोई कविता पढ़ते हुए मन शांत सरोवर सा हो जाता है। देवेंद्र की कविताएंँ पढ़ते हुए ऐसी छोटी-छोटी बातों/भावनाओं पर ध्यान जाता है जिनपर हम अमूमन ध्यान नहीं दे रहे होते। जीवन के कई पहलू बिना महसूसे ही गुज़र जाते शायद, यदि मैंने ‘कुढ़न’ न पढ़ी होती।

देवेंद्र को मैं शुरू से पढ़ती आयी हूँ, संग्रह में संकलित कई कविताएँ पहले भी पढ़ी हैं मैंने और ये बड़ी बात है कि किसी को किसी की कविताएँ याद रह जाएंँ। बहुत सी कविताएँ नई-नई सी लगीं, जो पहली बार पढ़ीं मैंने। पहले से अब में बहुत सुधार हुआ है लेखनी में और सुधार की रफ्तार यूँ ही बनी रही तो एकदिन हिंदी काव्य के क्षेत्र में “देवेंद्र दाँगी” एक बड़ा नाम होगा।

‘कुढ़न’ में यूँ तो सारी ही कविताएँ अच्छी हैं लेकिन जो मुझे ख़ास पसन्द आईं वो हैं - ‘इस दरख़्त पर गौरैया रहती थी’, ‘चाह’, ‘तुम्हारी याद आती है’, ‘नफऱत’, ‘सातवाँ फेरा’, और ‘मृत्यु’।

देवेंद्र भाई को शुभकामनाएँ इतने सुंदर और सराहनीय कार्य के लिए कि उन्होंने अपनी कविताओं को इकट्ठा कर हमारे लिए उन्हें एक ही जगह पढ़ना सुलभ बना दिया। लेखन के क्षेत्र में उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ! आप द्वारा इससे भी बेहतर पढ़ने को मिलेगा इसी उम्मीद के साथ!

सुप्रिया दुबे

यदि आपने अबतक ‘कुढ़न’ न पढ़ी हो तो Amazon Kindle से ऑर्डर करके पढ़ लें।




पौधरोपण

आज सुबह कॉलेज से सर का कॉल आया। सर ने कहा कि 1 बजे तक कॉलेज आ जाओ..पौधरोपण का कार्यक्रम है। फिर क्या! खुशी का ठिकाना नहीं रहा.. एक तो इतने दिनों के बाद कॉलेज जाने का मौका मिला था,  उसपे से पौधरोपण करने का पुण्य...मैं कॉलेज पहुँची तो देखा फीमेल में सिर्फ मैं थी, बाकी 4-5 प्रोफेसर्स और 3-4 लड़के (छात्र) थे। सबने एक-एक कर पौधा लगाया। मेरे हिस्से में नीम का पौधा आया। कॉलेज परिसर में ये पौधा मेरी निशानी रहेगा। अगले एक साल तक इसे वृक्ष बनते देखना कितना सुखद होगा! हालाँकि आस-पास प्रोफेसर्स के होने के नाते मैं सेल्फी नहीं ले सकी उसके साथ, इसका थोड़ा सा ग़म हुआ। 😌
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ख़ैर, खुशी का पलड़ा ग़म से भारी है आज! मैं कई दिनों से पौधरोपण करने की सोच रही थी मगर इधर कहीं खाली ज़मीन दिखती नहीं थी और किसी दूसरे की ज़मीन में बिना उसकी अनुमति के पौधा नहीं लगाया जा सकता था। आज ये इच्छा भी पूरी हो गई। मेरे ख़्याल से मैंने पहली बार ही किसी वृक्ष का पौधा लगाया। आगे ये सिलसिला जारी रहेगा।

#plantation
#thehappyme


सपना साकार हुआ

खुली तो पिछली रात देखा सपना याद आया।

“मैं किसी जगह से गुज़र रही थी। वहीं एक कमरा था, देखकर ही लगता था किसी लेखक का कमरा है। उसमें बड़ा सा बुकशेल्फ था जिसमें ढेरों क़िताबें रखी थीं। मैं भटकते हुए उस कमरे में पहुँची तो एकसाथ इतनी सारी क़िताबें देख ललचाई नज़रों से उन्हें निहारने लगी। तभी वहाँ खड़े एक लेखक जैसे व्यक्ति, जिनका चेहरा तो मुझे धुँधला ही दिख रहा था मगर ये लगा था कि ये अशोक जमनानी सर हैं, ने मेरे मन की बात भाँप ली और शेल्फ से निकालकर एक किताब मुझे दे दी। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।”

यह सपना कई दिनों तक मेरे दिमाग में चलता रहा। फिर एक दिन मैंने सोचा कि जिसके बारे में यह सपना था उसे बताया जाना चाहिए। मैंने सर को यह कहानी बताई। मैंने कहा - “सर! सपने में आपने मुझे एक क़िताब दी थी शायद वो 'स्वेटर' थी।” सर ने पूछा -  “आपने 'स्वेटर' पढ़ी है?” मैंने कहा “नहीं”। सर संवेदनशील हैं ही, उन्होंने मेरा एड्रेस लिया और मुझे यह किताब भेजने की बात कही।

कुछ ही दिनों बाद डाक से यह किताब मेरे हाथ में आयी। सपने के साकार होने पर जैसी खुशी होती है, ठीक वैसी ही खुशी हो रही थी मुझे।

परीक्षाओं के चलते मैं इसे पढ़ना टालती रही मगर जब परीक्षाएँ ख़ुद टलती गईं तो मैंने इसे पढ़ना शुरू किया। आज मैंने इस कहानी-संग्रह की आख़िरी कहानी पढ़ी।

आलोचना करने की समझ तो मुझमें नहीं है। इतना कहूँगी कि पढ़ने में मजा आया। इन कहानियों में से जो मुझे सबसे अधिक पसंद आईं वो हैं - 'अलग', 'स्वेटर', 'झुर्रियाँ' और 'परकम्मा वासिनी'। हर एक कहानी के शीर्षक का असल माने कहानी के आख़िर में समझ आता है। और यह बात आख़िर तक पहुँचने के दौरान उत्सुकता बनाए रखती है। 'परकम्मा वासिनी' के आख़िर में मेरी आँखों में नमी थी तो 'अलग' का आख़िरी हिस्सा पढ़कर हँसी आ गई।

'स्वेटर' को मैं जीवन भर इसलिए भी नहीं भूलने वाली हूँ क्योंकि यह पहली क़िताब थी जो मुझे ख़ुद उस किताब के लेखक ने भेजी।

कहते हैं सपने में वही लोग आते हैं जो आपके लिए मायने रखते हैं और वास्तव में मैं बचपन से (लगभग 8-9 साल से) सर के विषय में भईया से सुनती आयी हूँ। अख़बारों में सर के लेख पढ़ती रही हूँ। आज के दैनिक जागरण में निकला लेख भी मैंने पढ़ा। 'स्वेटर' पढ़ने के बाद आपकी बाकी किताबें पढ़ने का मन हो रहा है यदि सम्भव हो सका तो ज़रूर पढूँगी।

बहुत-बहुत धन्यवाद सर इस यादगार तोहफ़े के लिए !

हाँ, इस क़िताब की शुरुआत में आपकी लिखी एक कविता है, वो मुझे बहुत पसंद आयी, ये रही -

लिखना
कोई आदत नहीं
न कोई मजबूरी है मेरी
लिखना मुट्ठी भर सिक्कों के लिए
मंजूर नहीं मुझे
न बुनियाद होने की बेबसी
न कोई आलीशान कंगूरा मेरे ज़ेहन में है
बेख़ुदी नहीं ख़ुदाई भी नहीं
विसाल नहीं ज़ुदाई भी नहीं
तलाश नहीं
रास्ता नहीं
दर नहीं
आस्तां नहीं
पड़ाव नहीं कारवां नहीं
रहगुज़र बूढ़ी या कि फिर जवां भी नहीं
पाँव नहीं मंज़िल नहीं
धड़कन नहीं
दिल नहीं
वाज़ नहीं
नज़ीर नहीं
ख़्वाब नहीं
ताबीर नहीं
लिखना किसी पाने खोने पे
कहाँ फ़िदा ठहरा
लिखना
जर होने से
ज़ुदा ठहरा...






कहानी

चौराहों पर
जब मैं देखती हूँ भीड़ को,
भीड़ मुझे दिखती है
किसी कहानी-संग्रह की भाँति,
जिसमें हर एक शख़्स
एक कहानी है;
एक चलती-फिरती कहानी,
जिस शख़्स की कहानी
दर्ज़ कर देता है कोई लेखक, काग़ज़ों पर,
मरने से बच जाती है वह कहानी,
बाकी की कहानियाँ रह जाती हैं अनकही
जो तोड़ देती हैं दम
अपने कथानायक के मरने के साथ ही,
एक शख़्स में
इतना लेखक तो होना चाहिए
कि वह लिख सके
कम से कम
अपनी कहानी!

~ सुप्रिया दुबे © (१८/०६/२०२०)