सर्दी की एक शाम

बाईस जनवरी दो हजार इक्कीस। शाम का समय है। गोधूलि बेला होने में अभी थोड़ा समय शेष है। पढ़ाई के दबाव तले छत पर क़िताब लेकर ठीक वैसे ही टहल रही हूँ जैसे किसी अजायबघर में क़ैद कोई शेर गुस्से में इधर से उधर टहलता है, बस फर्क यह है कि मैं इंसान हूँ, गुस्से में नहीं हूँ और धीरे-धीरे टहल रही हूँ। 

अचानक पढ़ाई से ध्यान भटकता है और नज़र प्रकृति के माथे पर लगी उस लाल बिन्दी पर जाती है जो अपनी जगह से पल-पल खिसक रही है। आकाश की लाली को देखकर लगता है कि कोई नई नवेली दुल्हन विवाह पश्चात की प्रथम रात्रि के विषय में थोड़ी उत्साहित है किंतु शर्म उसके गालों को लाल किये दे रही है। पक्षियों का एक झुण्ड अपने आशियानों की ओर उन्मुक्त उड़ा चला जा रहा है। यह नववधू का मन लग रहा है, जो विवाहोपरांत भी स्वतंत्रता की आशा कर रहा है। उसे यकीन है उसका साथी उसके सपने देखने पर प्रतिबन्ध नहीं लगाएगा।

अचानक मुझे याद आता है कि कहीं बहते हुए कोई नदी सागर में मिल रही होगी। मगर उसका मिलना अनवरत होगा। उन दोनों की प्यास कभी नहीं बुझेगी। कितनी सुंदर लग रही है यह कल्पना! लेकिन यह क्या!? यह शोर कैसा! ध्यान जाता है उस ओर जहाँ निर्माणाधीन एक इमारत की छत बन रही है। उफ़्फ़! एक भयानक सन्नाटा है इस शोर में। वैज्ञानिकता का शोर कितना वीभत्स होता है!

शोर से ध्यान हटाने की कोशिश करती हूँ। देखने लगती हूँ अपने हाथों को। कितने साँवले पड़ गए हैं और पहले से काफी ऊरठ  गए हैं। आज कितने दिनों बाद ध्यान गया इनपर। नाख़ून भी लम्बे हो गए हैं, काटने हैं। पैरों को देखती हूँ। वह लाल नेलपॉलिश जो महीने भर पहले लगाई थी, अब कहीं-कहीं छूट चुकी है।

नज़र ऊपर उठाती हूँ। सामने के एक अन्य निर्माणाधीन दो मंज़िली इमारत पर एक मजदूर खड़ा है। थोड़ी और दूर देखती हूँ तो एक बड़ा सा टॉवर दीखता है। वह पास की इस इमारत से बड़ा है। कुछ चिड़ियाँ उड़-उड़कर उसपर बैठ रही हैं। तभी नज़र उस ओर जाती है जहाँ थोड़ी देर पहले लाल बिन्दी दीख रही थी। अब नहीं दीख रही है। शायद प्रकृति ने घूँघट कर लिया। 

गोधूलि बेला हो गई है और यही सोचकर मैंने क़िताब बन्द कर दी है और दौड़ पड़ी हूँ पेपर और पेन की तलाश में...

- सुप्रिया

(तस्वीर दो महीने पहले की है)