अवसाद

एक दिन तुम्हारी तस्वीर बनाने बैठी थी,
हाथ में काग़ज़ और पेन्सिल;
आँखों में तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा लिए,
तस्वीर बन तो गयी;
मगर जो चेहरा बना
वो उदास था,
मैं चाह कर भी तुम्हारे होठों पर
मुस्कान लाने में असमर्थ थी,

मैंने कई बार
तुम्हारी आँखों को मिटाया;
फिर बनाया,
तुम्हारे होठों को मिटाया;
फिर बनाया,
मगर हर बार
तुम्हारी आँखें उदास थीं,
मगर हर बार
तुम्हारे लब ख़ामोश थे,
जैसे कि मेरे हैं;
तुमसे दूर रहकर,

मैंने समझा -
अवसाद में किए गए सृजन में
रह जाता है अवसाद का अंश!

– सुप्रिया दुबे


एक समय बाद

निरन्तर साहित्य पढ़ने वाले की
आँखों की पुतलियाँ
एक समय बाद
ऊपर की ओर उठने लगती हैं
एक समय बाद
उसके व्यक्तित्व में आ जाती है
राम की सी गंभीरता
एक समय बाद
उसका मुख बुद्ध का सा दिखने लगता है!

~ सुप्रिया दुबे ©

पोस्टर- अभिषेक आर्यन

कम्बल

प्रेम में पड़ी हुई स्त्रियाँ
दिन में भी ओढ़ लेती हैं कम्बल;
कम्बल में निकले रोवें
उन्हें प्रतीत होते हैं
प्रिय के शरीर पर उगे रोंगटे के समान;
कम्बल से मिलने वाली गर्माहट
प्रिय के शरीर से निकलने वाली ऊष्मा है!

~ सुप्रिया दुबे ©