अवसाद

एक दिन तुम्हारी तस्वीर बनाने बैठी थी,
हाथ में काग़ज़ और पेन्सिल;
आँखों में तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा लिए,
तस्वीर बन तो गयी;
मगर जो चेहरा बना
वो उदास था,
मैं चाह कर भी तुम्हारे होठों पर
मुस्कान लाने में असमर्थ थी,

मैंने कई बार
तुम्हारी आँखों को मिटाया;
फिर बनाया,
तुम्हारे होठों को मिटाया;
फिर बनाया,
मगर हर बार
तुम्हारी आँखें उदास थीं,
मगर हर बार
तुम्हारे लब ख़ामोश थे,
जैसे कि मेरे हैं;
तुमसे दूर रहकर,

मैंने समझा -
अवसाद में किए गए सृजन में
रह जाता है अवसाद का अंश!

– सुप्रिया दुबे