आसमाँ पिघलने लगा

सावन का पहला दिन था। आसमान में काले बादल उमड़ रहे थे। लग रहा था तेज बारिश होने वाली थी। चारों ओर अंधेरा छा रहा था। देखते ही देखते मूसलाधार वर्षा होने लगी। मैं बरामदे में कुर्सी पर बैठी तुम्हारे बारे में सोच रही थी। बारिश इतनी तेज थी कि पानी की फुहारें मेरे ऊपर तक आ रही थीं। हवा के ठंडे झोंकों की छुवन में मैं तुम्हें महसूस कर पा रही थी।

पता नहीं क्यों, जब बारिश होती है तो तुम्हारी बहुत याद आती है। नहीं, ऐसा नहीं है कि बाकी समय नहीं आती लेकिन जब बारिश होती है तो कुछ ज्यादा ही...। शायद तुम्हें भी बारिश के समय मेरी याद आती होगी!

पता है? कबसे बादल घुमड़ रहे थे लेकिन बारिश नहीं हो रही थी, तभी मैं बरामदे में आई और तुम्हें याद करते हुए उन घुमड़ते बादलों को एकटक देखने लगी। और देखते ही देखते आसमाँ पिघलने लगा। मुझे लगा जैसे मैंने तुम्हें याद किया इसीलिए बादल आसानी से बरस पाए। हाँ! वर्षा प्रेम की ऋतु है ना! शायद इसीलिए।

मानो बूँदों के रूप में आसमान धरती पर अपना प्यार लुटाता है और धरती शर्म के मारे धानी चूनर ओढ़ लेती है। चारों ओर प्रकृति हँसती हुई सी नज़र आती है। पेड़ कैसे झूमते हैं जब बारिश होती है!

साल भर आसमान वाष्प के रूप में धरती से उसकी यादें सोखता है और जब विरह असहनीय हो जाता है तो आसमान रो पड़ता है और तब धरती को तसल्ली होती है कि आसमान उसे भूला नहीं है। जब मैंने तुम्हें याद किया तो आसमान कैसे फूट-फूटकर रोने लगा था!

मुझे लगता है जिस जगह प्रेमी और प्रेमिका एक-दूसरे को ज़्यादा याद करते हैं, उस जगह बारिश ज़्यादा होती है। जहाँ बारिश के समय दोनों एक साथ एक-दूसरे को याद करते हैं वहाँ बारिश के बाद इंद्रधनुष निकलता है। शायद जिस जगह बाढ़ अधिक आती है उस जगह प्रेमी-प्रेमिकाओं की संख्या ज्यादा होती है। सूखे से होने वाली मौतों के जिम्मेदार उस जगह के प्रेमी-प्रेमिका होते हैं।

   सुप्रिया दुबे ©
(सन्त कबीर नगर)