इस्मत चुग़ताई, भारतीय साहित्य का एक जाना-माना नाम, जिन्होंने अपने किरदारों के माध्यम से उस ज़माने की दबी-सकुचाई स्त्रियों की दशा का वर्णन किया और उस हिम्मत को साकार किया जो उनके लिए एक दिवास्वप्न ही थी। वह ज़माना था कि जब कोई लड़की तेज आवाज में बोलती थी या अपनी बात मनवाने के लिए ज़िद करती थी तो उसे सामान्य नहीं माना जाता था बल्कि माना जाता था कि इस पर किसी जिन्न का साया है।
उर्दू जगत में ‘इस्मत आपा’ के नाम से जानी जाने वाली इस्मत चुग़ताई ने अपने इस उपन्यास में समाज की सड़ी-गली परम्पराओं से आज़ाद होकर ‘दिल की दुनिया’ आबाद की है। यह कहानी है एक युवती की, जिसे शादी के बाद उसके शौहर ने छोड़ दिया था। समाज की कुंठित मानसिकता के चलते उसे कोई रास्ता न सूझता था मगर अपने ही जैसी एक बदनसीब ज़िन्दगी का साथ पाकर उसने अपनी ‘दिल की दुनिया’ आबाद कर ली।
यह पहली बार था जब मैंने ‘इस्मत आपा’ को पढ़ा। उर्दू लफ़्ज़ों को समेटे हुए यह किताब इस्लामी मजहब की एक झलक दिखलाती है। जाने क्यूँ मगर इसे पढ़ते हुए मुझे ‘साँवरिया’ फ़िल्म की याद हो आती थी। यह किताब मुझे मेरे एक फेसबुक फ्रेंड ने सुझाई थी। बिल्कुल पतली सी किताब है। यदि आप के पास समय हो तो आप इसे एक ही दिन में पूरा पढ़ सकते हैं।
Rating - ⭐⭐⭐⭐ 4/5
सुप्रिया दुबे ©

