मुझे किताबों का शौक कैसे लगा

हमारे स्कूल 'सरस्वती शिशु मंदिर' की छत छप्पर की बनी हुई थी। जैसा कि बारिश होने पर उसके टूटे-फूटे हिस्से से पानी टपकता था, उस दिन भी टपक रहा था। उसी दिन हमारे स्कूल में निरीक्षक आने वाले थे, पठन-पाठन की निगरानी करने। वे आये। उन्होंने बहुत सी बातें कही होंगी, मगर उनकी जो बात मुझे आजतक याद रह गई, वह थी - “किताबें हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं।” उस दिन मुझे यह वाक्य कुछ तर्कसंगत नहीं जान पड़ा। इसलिए भी क्योंकि उस वक़्त मेरे लिए किताबों का मतलब सिर्फ टेक्स्ट बुक से था जो कि हमें जबरन पढ़ाई जाती थीं। उस समय मैं कक्षा प्रथम में थी।

समय गुज़रा, अब हिंदी की टेक्स्ट बुक में मजेदार कहानियाँ पढ़ने को मिलने लगीं। इसके अलावा दीदी-भईया को बाल पत्रिकाओं का शौक होने के नाते घर के किसी कोने में चंपक, बालहंस, नन्हे सम्राट जैसी पत्रिकाएंँ पड़ी ही रहती थीं। ऐसे ही किसी दिन एक पत्रिका मेरे हाथ लगी। मैंने उसे पढ़ा। मुझे मजा आने लगा। फिर मैं घर में उपलब्ध सभी पत्रिकाएँ खोज-खोजकर पढ़ने लगी। 

दूसरी-तीसरी कक्षा में आते-आते ये शौक जाता रहा। परीक्षाओं और भारी बस्ते के बोझ तले यह शौक कब दम तोड़ दिया, पता ही नहीं चला। अब मेरा सारा ध्यान केवल स्कूली पढ़ाई में केंद्रित हो गया।

फिर जब मैं 9 वीं कक्षा में आयी। मुझे हिंदी की टेक्स्ट बुक में ‘मन्त्र’ कहानी पढ़ने को मिली। इसने मेरे मर चुके शौक को दोबारा ज़िंदा कर दिया। मेरी प्रेमचंद में रुचि बढ़ी। फिर घर में एक दिन मेरे हाथ ‘ग़बन’ लगी। यह पहला उपन्यास रहा जिसे मैंने पढ़ा और पूरा पढ़ा। फिर घर में मौजूद जितने भी दो-चार उपन्यास थे जैसे - सेवासदन, निरुपमा, हॉफ गर्लफ्रैंड मैंने सारे पढ़ डाले।

इनको पढ़ते-पढ़ते मैं 12 वीं में पहुँच गई। और 12 वीं के आख़िर में मुझे मिला- एंड्रॉइड फ़ोन। यहाँ से मेरे अंदर का बुकवार्म बड़ा और बड़ा होता गया। मैं इस बीच टूटी-फूटी कुछ लाइनें भी लिखने लगी थी। एक दिन भईया ने मुझे सुझाव दिया कि मैं फेसबुक पर एकाउंट बनाऊँ और पढ़ने-लिखने वाले लोगों से जुड़ूँ, जिनमें से कुछ के नाम भी बताए उन्होंने। मैं उनसे जुड़ी। अब मैं उनको पढ़ने के साथ-साथ अपना लिखा शेयर करने लगी। और इस तरह मेरे कई सारे पढ़ने-लिखने वाले दोस्त बनते गए। उनकी संगत में आने पर मुझे पता चला कि मैंने कितना कम पढ़ा है। जब वे अपने बुकशेल्फ की तस्वीरें साझा करते तो मैं उनके बुकशेल्फ से अपने छोटे से किताबों के ढेर की तुलना करती। और इसी प्रतिद्वंद्विता के चक्कर में मेरे किताबों के ढेर में एक-एक कर किताबें जुड़ती जा रही हैं। मैंने यहाँ बहुत कुछ सीखा। नए उभरते लेखकों के बारे में पता चला। इससे पहले मैं हिंदी को प्रेमचन्द, निराला, जयशंकर प्रसाद जैसे पुराने लेखकों तक ही सीमित समझती थी। मुझे लगता था कि अब हिन्दी में लिखने वाले लेखक नहीं रहे। अब हिंदी में उपन्यास नहीं लिखे जाते। मगर यहाँ आकर मेरी सोच बदली। मैं ‘नई वाली हिंदी’ से वाक़िफ़ हुई। मैंने इसके अंतर्गत लिखने वालों को पढ़ा। मेरे सोचने का दायरा बढ़ा। बहुत सी अच्छी आदतें डेवलप हुईं। ‘कविता कोश’ और ‘गद्य कोश’ जैसी वेबसाइट के बारे में पता चला। मैं वहाँ भी कुछ न कुछ पढ़ लेती हूँ। हालाँकि मैं स्क्रीन पे पढ़ने में उतना सहज महसूस नहीं करती। मैं पेपरबैक्स ही पढ़ती हूँ। 

ऐसे ही एक दिन यूट्यूब पर किसी क़िताब का रिव्यु सर्च करते वक़्त Helly नाम की एक Booktuber का एक Bookish वीडियो दिखा। मैंने उसके चैनल को Subscribe कर लिया। वहाँ मुझे किताबों से सम्बंधित वीडियोज देखने को मिलने लगे। हालाँकि वो इंग्लिश में वीडियो बनाती है फिर भी बहुत कुछ सीखने को मिला उससे। उसी का एक fb ग्रुप है ‘Helly Book Club’ नाम से। मैं उस क्लब की मेम्बर बनी तो वहाँ से बहुत से पढ़ाकू दोस्त बन गए मेरे। जिनसे बुक recommendations मिलते रहते हैं। मैं उनके साथ रीडिंग स्पीड भी compare करती हूँ। और इस तरह पहले से अब में काफी सुधार हो गया है मेरे पढ़ने की स्पीड में।

किताबें मुझे कभी भी अकेला महसूस नहीं होने देतीं। जब भी मुझे किसी विषय में मार्गदर्शन की जरूरत होती है, वे मेरी गुरु बन जाती हैं। जब भी मैं अकेली होती हूँ, वो मेरी दोस्त बनकर मुझसे बतियाती हैं। और यही कारण है कि इस लम्बे लॉकडाउन के दौरान भी मैं ऊबने से बच गई। आज मुझे निरीक्षक महोदय की बात याद आती है, उन्होंने ठीक ही कहा था। अब तो भीड़ में तन्हाई में, प्यास की गहराई में, मुझे किताबें ही याद आती हैं। 

जब भी कभी कोई मुझे किताबें गिफ्ट करता है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। मैंने तो अपने दोस्तों से कह रखा है कि जब भी मेरे जन्मदिन पर मुझे कुछ देना हो तो किताब ही देना और वो भी मेरी पसंद की। कुछ दोस्तों से मुझे किताबें मिली भी हैं। जिन्हें मैं बहुत सँभालकर रखती हूँ। मुझे लगता है कि यदि आप चाहते हों कि कोई शख़्स आपको बार-बार याद करे तो उसे एक क़िताब गिफ्ट कर देनी चाहिए। ऐसे में जब भी वह उस किताब को पढ़ेगा या अपनी किताबों को Arrange करेगा, उसे आपकी याद आएगी। वो आपको कभी नहीं भूल पाएगा। और लगे हाथ उसका भी कल्याण होगा।

पता है? मुझे जब भी किसी लम्बी यात्रा पर जाना होता है, मैं अपने साथ कोई किताब जरूर ले जाती हूँ।  यहाँ तक कि अगर शादी जैसे व्यस्त माहौल में भी जाना होता है तब भी।  ये बात और है कि वहाँ पढ़ने का माहौल न मिलने से किताब जस की तस वापस लौट आती है फिर भी मैं उन्हें साथ रखती हूँ, मुझे उनका साथ अच्छा लगता है। 

इसी साल फरवरी महीने में मेरा एक शादी में पहली बार लखनऊ जाना हुआ। मैं वहाँ शादी के दिन से 2-3 दिन पहले पहुँची थी। वहाँ रस्मों से समय निकालकर मैं हजरतगंज स्थित यूनिवर्सल बुकस्टोर पहुँची। मैंने वहाँ 2-3 घण्टे बिता दिए, महज किताबों को निहारने में। फिर अपनी लिस्ट में लिखी किताबें खरीदीं और वापस लौट आई। यह मेरी ज़िंदगी का एक यादगार दिन रहा। वहाँ पहुँचकर मुझे अपने शहर में एक ऐसे बुकस्टोर की कमी खली। मैंने तय किया कि कुछ समय बाद मैं अपने शहर में भी एक छोटा ही सही पुस्तकालय खुलवाऊँगी ताकि आने वाली पीढ़ी को अमेज़न से क़िताब न मँगाना पड़े, उनको हफ़्ते भर किताब के आने का इंतज़ार न करना पड़े और उनका डिलीवरी चार्ज भी बचे।

मैंने अभी अपनी किताबों को फर्श पर ही अखबार बिछाकर तह किया है। जिनमें हर हफ़्ते नई किताबें जुड़ती जा रही हैं। अब किताबों को एक बुकशेल्फ की शख़्त जरूरत है। लॉकडाउन से उबरने के बाद सबसे पहला काम जो मैं करूँगी, वह है- एक बुकशेल्फ बनवाना। मैं तख़्त पे सोऊँ और मेरी किताबें ज़मीन पर पड़ी रहें, मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता।

Supriyaa Dubeyy  ✨


हाथ थाम लेना

कई बार
बेहतरीन की तलाश में
हम गँवा देते हैं 
बेहतर का भी साथ 

और जिस बेहतरीन की तलाश होती है हमें
वो बेहतरीन
हमें कभी नहीं मिलता

जो भी मिलता है
उसमें रहती हैं कमियाँ 

जो तुम्हें थोड़ा सा भी समझता हो
करता हो तुम्हारी थोड़ी सी ही फ़िक्र
उसे जाने न देना
हाथ थाम लेना!

○○○🌸○○○

सुप्रिया दुबे

[ Painting - Two Human Beings. The Lonely Ones by Edvard Munch]


कुढ़न (समीक्षा)

‘कुढ़न’ की आख़िरी कविता पढ़ी आज मैंने। इस कविता-संग्रह को पढ़ते हुए कभी संयोग शृंगार का रस मिलता है, कभी वियोग का तो कोई कविता पढ़ते हुए मन शांत सरोवर सा हो जाता है। देवेंद्र की कविताएंँ पढ़ते हुए ऐसी छोटी-छोटी बातों/भावनाओं पर ध्यान जाता है जिनपर हम अमूमन ध्यान नहीं दे रहे होते। जीवन के कई पहलू बिना महसूसे ही गुज़र जाते शायद, यदि मैंने ‘कुढ़न’ न पढ़ी होती।

देवेंद्र को मैं शुरू से पढ़ती आयी हूँ, संग्रह में संकलित कई कविताएँ पहले भी पढ़ी हैं मैंने और ये बड़ी बात है कि किसी को किसी की कविताएँ याद रह जाएंँ। बहुत सी कविताएँ नई-नई सी लगीं, जो पहली बार पढ़ीं मैंने। पहले से अब में बहुत सुधार हुआ है लेखनी में और सुधार की रफ्तार यूँ ही बनी रही तो एकदिन हिंदी काव्य के क्षेत्र में “देवेंद्र दाँगी” एक बड़ा नाम होगा।

‘कुढ़न’ में यूँ तो सारी ही कविताएँ अच्छी हैं लेकिन जो मुझे ख़ास पसन्द आईं वो हैं - ‘इस दरख़्त पर गौरैया रहती थी’, ‘चाह’, ‘तुम्हारी याद आती है’, ‘नफऱत’, ‘सातवाँ फेरा’, और ‘मृत्यु’।

देवेंद्र भाई को शुभकामनाएँ इतने सुंदर और सराहनीय कार्य के लिए कि उन्होंने अपनी कविताओं को इकट्ठा कर हमारे लिए उन्हें एक ही जगह पढ़ना सुलभ बना दिया। लेखन के क्षेत्र में उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ! आप द्वारा इससे भी बेहतर पढ़ने को मिलेगा इसी उम्मीद के साथ!

सुप्रिया दुबे

यदि आपने अबतक ‘कुढ़न’ न पढ़ी हो तो Amazon Kindle से ऑर्डर करके पढ़ लें।




पौधरोपण

आज सुबह कॉलेज से सर का कॉल आया। सर ने कहा कि 1 बजे तक कॉलेज आ जाओ..पौधरोपण का कार्यक्रम है। फिर क्या! खुशी का ठिकाना नहीं रहा.. एक तो इतने दिनों के बाद कॉलेज जाने का मौका मिला था,  उसपे से पौधरोपण करने का पुण्य...मैं कॉलेज पहुँची तो देखा फीमेल में सिर्फ मैं थी, बाकी 4-5 प्रोफेसर्स और 3-4 लड़के (छात्र) थे। सबने एक-एक कर पौधा लगाया। मेरे हिस्से में नीम का पौधा आया। कॉलेज परिसर में ये पौधा मेरी निशानी रहेगा। अगले एक साल तक इसे वृक्ष बनते देखना कितना सुखद होगा! हालाँकि आस-पास प्रोफेसर्स के होने के नाते मैं सेल्फी नहीं ले सकी उसके साथ, इसका थोड़ा सा ग़म हुआ। 😌
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ख़ैर, खुशी का पलड़ा ग़म से भारी है आज! मैं कई दिनों से पौधरोपण करने की सोच रही थी मगर इधर कहीं खाली ज़मीन दिखती नहीं थी और किसी दूसरे की ज़मीन में बिना उसकी अनुमति के पौधा नहीं लगाया जा सकता था। आज ये इच्छा भी पूरी हो गई। मेरे ख़्याल से मैंने पहली बार ही किसी वृक्ष का पौधा लगाया। आगे ये सिलसिला जारी रहेगा।

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