कसप (समीक्षा)

आज ५ दिनों के पठन के बाद मैंने ‘कसप’ को जैसा पाया ठीक वैसी ही राय थी मेरी इसके विषय में इसे पढ़ने से पहले। और यही कारण रहा जब भी कोई मुझसे किताबें सुझाने को कहता मैं ‘कसप’ का नाम जरूर लेती। ‘कसप’ से मेरा पहला परिचय कब हुआ था मुझे ठीक से याद नहीं, शायद जब प्रभात रंजन जी की ‘पालतू बोहेमियन’ में पढ़ा था मैंने इसका नाम या शायद जब फेसबुक पर सत्य व्यास ने सुझाया था इस किताब को। इसे पढ़ने से पहले मैंने इस क़िताब पर बहुत कुछ पढ़-सुन रखा था। मैं इसे पढ़ने से पहले से ही बेबी-डी डी को जानती थी। मैं जानती थी यह पहाड़ी पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास है। मैं जानती थी इसमें कुमाऊँनी शब्दों का भरपूर प्रयोग हुआ है। मैं जानती थी कि इसे जोशी जी ने महज ४० दिनों में लिखा था। और जब से मैंने यह जाना था, यह क़िताब मेरी टी.बी.आर. लिस्ट में ऐड हो गई थी। और यह ठहरी एक प्रेम कहानी तो वैसे भी मुझसे जादे दिन बचने वाली थी नहीं।

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जैसा कि क़िताब का शीर्षक है - ‘कसप’ यानी ‘क्या जाने’। मैं इस क़िताब के विषय में कुछ कहकर इसके शीर्षक को झुठलाना नहीं चाहती और न मैं कुछ कह ही पाऊँगी। हाँ इतना कहूँगी कि क़िताब के शुरुआत में लेखक की शैली और कुमाऊँनी शब्दों का प्रयोग मुझे थोड़ा अटपटा सा लगा, लेकिन फिर मैं उसकी अभ्यस्त हो चली। लेखक ख़ुद इस कहानी को सुनाता है और जिस तरह वैदिक मन्त्रादि का उल्लेख हुआ है इससे लगता है लेखक काफी विद्वान है और क़िताब के पीछे छपी उनकी छोटी सी तस्वीर में धीर गंभीर चेहरे पर चश्मा लगाए काले घेरे लिए हुए थकी-थकी हुई आँखों से लगता भी है। मैं इस क़िताब के हर दो पन्ने पढ़ने के बाद क़िताब के आखिरी पृष्ठ पर छपी उस धीर गंभीर तस्वीर में अध्ययन करते-करते थक चुकी सी आँखों को देखते हुए यही सोच रही थी कि मैं बियाह करूँगी तो किसी ऐसी ही पढ़ी-पढ़ी सी थक चुकी आँखों वाले से, हालाँकि वो मेरा हमउम्र होगा। लाज़िम ही है ऐसी रसभरी क़िताब पढ़ते हुए ऐसे उलूल-जुलूल से ख़याल पाठक के मन में आ जाएँ। देखते हैं अपनी कहानी कहाँ शुरू होती है। गुसलखाने से तो नहीं ही शुरू होगी, उम्मीद है।

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अब यह क़िताब तो पूरी हुई। लेकिन मेरे लिए एक समस्या आ ठहरी कि अब मैं जो भी वाक्य बोल रही उसके अंत में ‘ठहरा’, ‘ठहरी’ और ‘बल’ जैसे शब्द बोलने से ख़ुद को मुश्किल से रोक पा रही। कुछ दिन तो इसका असर रहना ही है।

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~ सुप्रिया दुबे 🌸

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Independence Day 2020

 15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हो गया। देश का पुरुष वर्ग आज़ाद हो गया लेकिन देश की महिलाएँ, लड़कियाँ आज भी इक कैद में हैं, वे मजबूर हैं घरों में रहने के लिये। और उनकी इस कैद का ज़िम्मेदार है यह समाज। सबसे पहले तो खुद उनके ही घरवाले। जिनमें से कुछ तो बाहरी दुनिया को बेटियों के लिए असुरक्षित मानते हुए मजबूर हैं और कुछ रूढ़िवादिता से ग्रसित होने के कारण 'गैर जिम्मेदार' हैं। हमने एक ऐसा समाज बना दिया है जिसमें लड़कियों के मन में असुरक्षा का डर बैठ गया है। 


आज कोविड-19 नामक वैश्विक महामारी के चलते पुरुष वर्ग भी महीनों से घरों में कैद है, यही समय है महसूस करने का कि कैसा लगता है लड़कियों को कैद में रहते हुए। आप तो 5 महीनों में ही उकता गए। 


अब जरूरत है कि देश का हर पुरुष गुंजन सक्सेना जी के पिता की तरह सोचे, और अपने देश की बेटियों को “पिंजरा तोड़ के उड़ जाने” के लिए प्रेरित करे। जिस दिन यह समाज बेटियों को एक सुरक्षित परिवेश दे सकेगा, बेटियाँ आज़ाद होंगी, और सही मायने में तब जाकर हमारा पूरा देश आज़ाद होगा। जब तक देश का एक भी वर्ग कैद में है, हम देश को आज़ाद नहीं कह सकते।


~ सुप्रिया दुबे 🌸


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#GunjanSaxena


[ In frame - Flight Lieutenant Miss Gunjan Saxena, the only woman who served the country in The Kargil War, with her father, Mr. Anup Saxena ]



मुझे माफ़ करना मेरे दिल!

जानते हो? जब मैं तुमसे बात करती हूँ, मुझे लगता है मैं स्त्री हूँ, ख़ूबसूरत हूँ। कई-कई दिनों तक जब तुमसे बात नहीं होती, मेरे अंदर पुरुषों की सी रुखाई आ जाती है। मुझे अपने लम्बे बाल छोटे-छोटे, बॉयकट से लगने लगते हैं। मुझे लगता है, मेरी आवाज भारी होती जा रही है। 


हाँ, यह सच है, अब तुम मुझे पहले जितने पसन्द नहीं रहे। न जाने क्यूँ, मुझे तुमसे एक चिढ़न सी होती है अब, लेकिन मैं आज भी तुमसे प्रेम करती हूँ। सच है, मैं न चाहते हुए भी तुमसे प्रेम करती हूँ। न चाहते हुए भी तुम मेरे सपने में अक्सर आ जाते हो। और जैसे हम दोनों असल जिंदगी में दो ध्रुवों की भाँति दूर-दूर हैं, सपने में भी दूर होते हैं। आज भी जब मैं अरिजीत के गाने सुनती हूँ। बस तुम्हें ही महसूस कर पाती हूँ। 


लोग कहते हैं "प्यार इंसान को मजबूत बनाता है", लेकिन मेरे साथ उलट हो रहा है। मैं तुम्हारे प्यार में खुद को कमजोर महसूस कर रही हूँ। यह जानते हुए भी कि मुझे तुम्हारा प्यार कभी नहीं मिलेगा, मैं तुमसे प्यार किये जा रही हूँ। मुझे डर है, क्या मैं सहन कर सकूँगी तुम्हें किसी और का होता हुआ देखकर? जब कि मुझे पता है, एक दिन निश्चित रूप में ऐसा होना है। मैं तुम्हें बाँध नहीं सकती, तुम स्वतंत्र हो।


धीरे-धीरे मुझे समझ आ रहा है कि तुम्हारी पसन्द मेरी पसन्द से अलग होती जा रही है। एक समय था, जब हमें लगता था कि हम एक-दूसरे की परछाईं हैं, लेकिन यह सारी बातें आज मिथ्या साबित हो रही हैं। अब मुझे तुममें नकारात्मकता दिखाई पड़ती है और मैं ठहरी सकारात्मकता की पुजारिन, हमारा मेल हो भी गया तो शायद सारी उमर लड़ते ही बीते। नहीं मैं तुम्हारे लिए ठीक लड़की नहीं हूँ। मैं शायद तुम्हें वह सब न दे सकूँगी जो तुम्हें मिलना चाहिए। मैं तुम्हारे साथ खुश रह भी लूँ मगर तुम मेरे साथ खुश न रह सकोगे। और मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर खुश देखना चाहती हूँ।


मैं बहुत कोशिश करती हूँ कि तुमसे दूर हो जाऊँ। तुमसे बात करना कम कर दूँ। इसीलिए मैं कभी बात करने की पहल नहीं करती। मगर कई दिनों बाद जब तुम्हारा msg आता है, तुम पूछते हो - "कहाँ गायब हो?", मैं जवाब दिए बिना रह नहीं पाती। फिर हमारी बातें लम्बी होती जाती हैं। मैं भूल जाती हूँ मुझे तुमसे दूर रहना था। 


तुम आज भी मुझे हँसाने की कोशिश करते हो, मगर आज मैं पहले की तरह हँस नहीं पाती। पहले तुम किसी और लड़की से बतियाते थे, मुझे जलन नहीं होती थी। मगर आज जब निश्चित है कि तुम किसी और के हो जाओगे। मुझे उनसे जलन होती है। मगर तुम तो अपनी आदत से मजबूर किसी से भी हँसी-मजाक करने लगते हो। तुम क्या जानो कैसा लगता है! तुम्हें तो कभी किसी से प्रेम हुआ ही नहीं। हुआ भी तो अजीबों गरीब चीजों से। बकरी के छोटे बच्चों से, किसी के पैरों की पायल से, हरे खेत-खलिहानों से। कैसे पागल हो तुम! कभी-कभी खुद को कोसती हूँ, मैं क्यों लड़की जन्मी! क्यों न हो गई किसी के पैरों की पायल! 


इस जनम में हमारा मेल नहीं होना है। विधाता लिख भी दें तो मैं होने नहीं दूँगी। हाँ भले ही मेरे हिस्से में महज़ तुम्हारी यादें आएँगी। तुम्हें जैसी सजी-सँवरी, नाजुक सी लड़कियाँ पसन्द आती हैं, मुझे पता है मैं उनके जैसी नहीं हूँ। और न ही मैं तुम एक के लिए ख़ुद को बदल सकती हूँ। तुम भले ही मुझसे प्यार नहीं करते, लेकिन मैं तुम्हारे साथ ही साथ खुद से भी बहुत प्यार करती हूँ। तुम एक का प्यार पाने के लिए मैं जीवन भर झूठा नाटक नहीं कर सकूँगी। मैं बहुत ही बेकार अभिनेत्री हूँ। मेरा भेद सामने आ ही जाएगा एक दिन। और फिर ख़ुद को बदलकर मैं भले ही तुम्हारा प्यार पा लूँ, मैं अपना प्यार खो दूँगी अपने लिए। और मैं जैसी हूँ, अगर वैसी ही रह गई तो निश्चित ही एक दिन अपने निर्धारित लक्ष्य को पा लूँगी। मुझे समाज की भलाई के लिए करनी होगी - झुमका, बिंदिया, पायल की कुर्बानी। मुझे माफ़ करना मेरे दिल, मैं तुम्हारी काम न आ सकूँगी।


नोट - उपरोक्त सभी बातें काल्पनिक हैं।


~ सुप्रिया दुबे 🌸