बदलते मौसमों का गवाह हूँ मैं

वह उड़ता हुआ ठीक मेरे सामने आकर गिरा और मैं चलते-चलते रुक गई। मैंने उसे अपने हाथों में उठा लिया और उलट-पलटकर उसे देखने लगी। वह देखने में काफी जीर्ण लग रहा था। मानो वह अपनी आख़िरी साँसें ले रहा हो। वह जाते-जाते मुझसे कुछ कहना चाह रहा था कि सुनो! मैं रोजाना न जाने कितने ही लोगों को इस सड़क से गुजरते हुए देखता हूँ। मैं किसी के भी सामने गिरकर दम तोड़ सकता था और उसे इस बात की ख़बर तक न होती लेकिन मैं तुम्हारे सामने गिरा क्योंकि तुम मुझे बिल्कुल अपनी सी लगी।

मैंने मौसमों को बदलते हुए देखा है। गर्मी, जाड़ा, बरसात इन सबका सामना किया है लेकिन मैंने हालातों के सामने कभी हार नहीं मानी। मैं निरन्तर अपना काम करता रहा। आज मैं जाता हूँ लेकिन मेरी आत्मा को शांति ही मिलेगी। तुम्हारे जीवन में भी सुख-दुःख आएँगे। अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाते हुए कभी-कभी तुमको लगेगा कि अब बस और आगे जाना तुम्हारे बस का नहीं है लेकिन तुम उस वक़्त हार मत मानना। जीवन में हमेशा दूसरों की मदद करने की कोशिश करना, दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करना और तुम पाओगी कि तुम्हें अपार खुशी मिल रही है।

यकीन मानो इस संसार में कोई किसी का नहीं है, सब अकेले ही आए हैं और अकेले ही चले जाएँगे, बस बची रह जाएँगी उनकी यादें और वह भी बस उन्हीं की जो यादगार काम कर जाएँगे, जो दूसरों के लिए जीकर जाएँगे।

तुम्हें जीवन में तरह-तरह के लोग मिलेंगे उनमें से कुछ बस अपना स्वार्थ साधने की कोशिश करेंगे, तुम्हें इन सबसे विचलित नहीं होना है। तुम अपना ध्यान बस अपने लक्ष्य पर लगाना। नकारात्मक लोगों से दूर रहना। कभी भी किसी दूसरे के लिए खुद को मत बदलना क्योंकि तुम जैसी भी हो... 'अद्वितीय' हो। जीवन में आदर्श तो बनाना लेकिन हूबहू किसी की तरह बनने की कोशिश मत करना, इससे तुम अपना वास्तविक स्वरूप खो दोगी।

बस यही कुछ बातें कहना चाहता था तुमसे। तुम सोच रही होगी मैं तुमसे यह सबकुछ क्यों कह रहा हूँ...तो वो इसलिए...कि तुमने मुझ गिरते हुए को अपने हाथों में उठा लिया। बस इतना काफ़ी है मेरे खुश होने के लिए। जीवन में छोटी-छोटी खुशियाँ ही मायने रखती हैं। कुछ बड़ा होने के इंतज़ार में हमें छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि खुशी बस मन की एक अवस्था है। हो सकता है कोई छोटी सी बात तुम्हें वो खुशी दे जाए जो कुछ बड़ा होने पर भी न मिले... तो बस हर बात में खुशियाँ तलाशने की कोशिश करना। अपने सपनों और अपने शौक को पूरा करने में खुद को इतना व्यस्त रखना कि किसी बात का दुःख मनाने के लिए तुम्हारे पास फुर्सत ही न रहे।

मेरी ये बातें याद रखना। अब जाता हूँ...हमेशा खुश रहो, मुस्कुराती रहो। और इतना कहकर उसने दम तोड़ दिया। मैंने उसे वहीं सड़क के किनारे रख दिया और अपने रस्ते चल पड़ी।

इस घटना के बाद कई दिनों तक मैं उस पत्ते के बारे में सोचती रही। मैं पछता रही थी कि मैंने उसे वहीं क्यों छोड़ दिया। मुझे उसे अपने साथ लाना चाहिए था। मैं उसे अपनी किसी किताब में रख सकती थी और समय के साथ उसमें होने वाले परिवर्तनों को देख सकती थी। एक समय बाद बस एक जाल-सा शेष रह जाता और मैं जब-जब उसे देखती, वह मुझे अहसास कराता कि यह जीवन नश्वर है।

© सुप्रिया दुबे

शौक बड़ी चीज है

मुझे बचपन से ही पेंटिंग्स का बहुत शौक रहा है। छोटी थी तो बहुत पेंटिंग बनाती थी, इधर 4-5 साल से सब बन्द था। ऐसा भी नहीं है कि तब बहुत समय था मेरे पास या अब समय नहीं रहता। कहीं न कहीं बड़े होते ही हम अपने शौक को समय देना बंद कर देते हैं। खुद को रोज-रोज के उन्हीं घिसे-पिटे कामों तक सीमित कर लेते हैं और परिणाम यह होता है कि हमारी जिंदगी कब नीरस हो जाती है, हमें पता भी नहीं चलता।

कल दोपहर ख़याल आया कि क्यों न इस शौक में दोबारा रंग भरा जाए!...फिर क्या! मैं निकल पड़ी उसी धूप में रंग, ब्रश और पेंटिंग के बाकी समान लाने। मुझे इस पेंटिंग के लिए एक्रेलिक कलर की जरूरत थी लेकिन यहाँ किसी दुकानदार ने पहले कभी एक्रेलिक कलर का नाम तक नहीं सुना था, नतीजतन मुझे पोस्टर कलर से ही काम चलाना पड़ा और जहाँ 10 या 12 नम्बर ब्रश की जरूरत थी वहाँ 3 और 5 नम्बर ब्रश का इस्तेमाल करना पड़ा।

मैंने कल दोपहर यह पेंटिंग बनानी शुरू की थी और पूरी होते-होते रात के 1 बज गए। मैंने बीच-बीच में ब्रेक भी लिया था और मैं ठहरी अभी नौसिखुआ इसलिए शायद कुछ ज़्यादा ही समय लग गया। ख़ैर, सीमित संसाधनों में ही सही, मेरा शौक पूरा हुआ।

कल जगह-जगह मंदिरों पर मेले लगे थे लेकिन मैं कहीं नहीं गई क्योंकि मुझे आज ही ये पेंटिंग पूरी करनी थी। अब जब यह बनकर तैयार है तो मुझे बहुत खुशी हो रही है। मैं सुबह से कई बार इसे देख चुकी हूँ... और जब-जब देख रही हूँ, चेहरे पर एक मुस्कान आ जा रही है।

तो इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
यही कि अगर हम खुश रहना चाहते हैं तो हमें शौक पाल लेने चाहिए, सीमित संसाधनों में ही सही, उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि जब शौक पूरे होते हैं तो बहुत खुशी मिलती है। मनोज वाजपेयी भी तो मानते हैं - "शौक बड़ी चीज है"

© सुप्रिया दुबे

छठिया ही छठिया बोलाईला हो

आज तिन छट्ठी (हल छठ/हर छठ) का व्रत है। आज के दिन महिलाएँ अपनी संतान की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। मेरी अम्मा ने भी महुआ, दही, तिन्नी के चावल आदि सामानों की थाली सजा ली है। मुझे भी अम्मा के साथ छठ मईया की पूजा में जाना है। घर से थोड़ी दूरी पर ही एक शिवालय है, वहीं सब महिलाएँ पूजा के लिए इकट्ठी हो रही हैं। मैं बचपन से ही इस पूजा में शामिल होती आई हूँ। मुझे अच्छा लगता है महिलाओं का वो एक साथ सोहर गाना और वो महुआ के पत्ते पर दही और महुआ का प्रसाद।

आज भोर से ही मोहल्ले में काफी चहल-पहल है। महिलाएँ जल्दी-जल्दी अपने घर के काम ख़त्म कर रही हैं। कुछ घरों में तो भोजन बनाने की जिम्मेदारी भी आज लड़कियों की है। जो महिलाएँ हमेशा एक-दूसरे के घर में ताका-झाँकी करती थीं, वे सब भी आज एक साथ हँसते-बतियाते पूजा के लिए जा रही हैं। संतान की आयु बढ़ाने के साथ ही यह व्रत महिलाओं के बीच सौहार्द भी बढ़ाने वाला है।

अम्मा हमारी जल्दी-जल्दी तैयार हो रही हैं। बगल वाली चाची की लड़की "छोटी" सुबह से दो बार बुलाने आ चुकी है। बताती है कि चाची अम्मा के साथ ही पूजा करने जाएँगी। चाची इंतजार कर रही हैं यह जानकर हम जल्दी-जल्दी तैयार हो गए हैं। अम्मा ने पूजा की थाली उठा ली है और मैंने अपना बैग और मोबाइल क्योंकि वहीं से मुझे कॉलेज के लिए निकल जाना है।

अम्मा और चाची आगे-आगे बतियाते हुए चल रही हैं और मैं उनके पीछे-पीछे चलते हुए बिना उनको जताए उन्हें मोबाइल के कैमरे में कैद किए जा रही हूँ। हम अब पूजा स्थल पर पहुँच गए हैं। वहाँ पहले से ही मौजूद महिलाएँ सोहर गा रही हैं। पास के ही सरकारी नल पर अपने-अपने पैर धुलकर अम्मा और चाची भी पूजा करने लगी हैं। इस पूजा का भी अपना अलग विधान है। जमीन में कुश गाड़कर उसकी पूजा की जाती है। मैं पास ही खड़ी देख रही हूँ, महिलाएँ गीत गाते हुए कुश में गाँठ लगा रही हैं... फूल, महुआ, चावल आदि चढ़ा रही हैं। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं -

“छठिया ही छठिया बोलाईला...छठिया न बोले लिन हो...छठी माई कवने परासे तर लुकइलिन, बोलवले नाही बोले लिन हो?”

बड़ा मनमोहक लग रहा है यह दृश्य। मैं इन पलों को कैमरे में कैद करती जा रही हूँ। पूजा अब समाप्त हो चुकी है। अब अम्मा मुझे पास बुलाकर छठ मईया को प्रणाम करने के लिए कह रही हैं। मैंने प्रणाम कर लिया और अम्मा ने मेरे माथे पर एक टीका लगा दिया है। अब बारी है महुआ, दही और तिन्नी के चावल के प्रसाद की, जो महुआ के पत्तों पर दिया जाता है। मैंने प्रसाद ले लिया है और मंदिर में दर्शन आदि करने के बाद अब हम वापस लौट रहे हैं।

अम्मा और चाची तो घर निकल गईं हैं, वहीं मैं इन पलों को यादों में सजाते कॉलेज की ओर बढ़ चली हूँ। अब तो बस रात का इंतज़ार है जब तिन्नी का चावल और मरसा का साग खाने को मिलेगा।

© सुप्रिया दुबे



जहाँ मैं बराबर आप

“दूरियाँ प्यार को और भी बढ़ा देती हैं” आप ही तो कहते हैं और सही ही कहते हैं। मैंने देखा है आप जब-जब मुझसे दूर हुए हैं, आपके लिए मेरा प्यार और भी बढ़ गया है। आप जब मुझसे दूर होते हैं तो मुझे आपको याद करने का मौका मिल जाता है और तब मैं आपको याद करके खूब रोती हूँ। मुझे आपको याद करना पसंद है। मैं खुद चाहती हूँ कि आप थोड़े दिनों के लिए मुझसे दूर हो जाइए ताकि मैं आपको याद करके खूब रो सकूँ।

उस दिन मैंने आपसे बिना मतलब का झगड़ा कर लिया। आपको आश्चर्य हुआ होगा मेरे बर्ताव पर। मुझे खुद आश्चर्य हुआ अपने ऊपर कि मैं आपसे झगड़ा कैसे कर सकती हूँ, वो भी बिना बात के! यह पहली बार था जब हमारे बीच झगड़ा हुआ हो। आपको शायद ना पता हो लेकिन उस रात मुझे नींद नहीं आई थी। मैं अपने बर्ताव पर पछता रही थी। मेरी आँखों के कोर भींगे हुए थे। अगले दिन भी सारा दिन रोती रही थी। मगर मैंने जान बूझकर ऐसा किया था। मैं आपसे दूर हो जाना चाहती थी। कहीं न कहीं आपने ही मुझे दूरी की आदत लगा दी है और अब जब वही दूरी मुझे नहीं मिलती तो मैं खुद कुछ ऐसा कर बैठती हूँ कि आप मुझसे दूर हो जाइए।

मेरा प्यार भी बड़ा अजीब है ना? जहाँ बाकी सबको एक पल की भी जुदाई बर्दास्त नहीं होती वहीं मैं खुद जुदाई के रास्ते बनाती हूँ। मुझे आपको याद करना आपके पास होने से भी कहीं अधिक पसंद है। मैं कभी नहीं चाहती कि मेरा मन आपसे भर जाए इसलिए मैं कभी-कभी आपसे दूर हो जाती हूँ और शायद आप भी इसीलिए मुझसे दूर हो जाते हैं। हमारा स्वभाव एक-दूसरे से कितना मिलता है ना! लगता है जैसे दोनों दो न हों बल्कि एक ही हों। आप भी तो कहते हैं “मेरा और तुम्हारा नाम जैसे एक ही व्यक्ति के दो नाम हों”

मैंने कभी आपसे प्रेम के बदले प्रेम की कामना नहीं की है। और न ही कभी यह जानने की कोशिश की है कि आप मुझसे प्रेम करते भी हैं या नहीं। मैं तो बस अपने मन की जानती हूँ। मैंने आप पर कभी अधिकार नहीं जताया बल्कि हमेशा आपको स्वतंत्र छोड़ा है। आप जब बाकी लड़कियों से हँसी-मजाक करते हैं तो मुझे जलन भी नहीं होती है। कोई आपको मुझसे छीन भी ले मगर मेरे दिल से आपको कोई अलग नहीं कर सकता।

अभी तो हमारा सारा जीवन पड़ा है। हो सकता है परिस्थितिवश मेरे जीवन में कभी कोई और आ जाए लेकिन मेरे दिल में आपके सिवा कभी कोई और नहीं आ सकता। हाँ ये सम्भव है कि आप कल किसी और के हो जाइए लेकिन यकीन मानिए जितना प्यार मैं आपसे करती हूँ कोई और न कर सकेगा। मेरी हर प्रार्थना में आप होंगे। मैं जो भी व्रत रखूँगी, जिस भी मंदिर में जाऊँगी, आपके लिए, आपकी सफलता के लिए भगवान से प्रार्थना करूँगी।

और एक बात, आप हँसते-हँसाते मुझसे हमेशा के लिए दूर हो जाइए, मैं आपके साथ बिताए पलों को याद करते हुए सारा जीवन बिता दूँगी, लेकिन अगर आप मुझसे नाराज़ होकर अलग हुए तो शायद ही कोई ऐसा दिन बीतेगा जिस दिन मैं खुद को कोसूँगी नहीं, जिस दिन मैं रोऊँगी नहीं। मैं सब कुछ सह सकती हूँ लेकिन आपकी नाराज़गी नहीं सह पाऊँगी।

मैं आपको जल्दी कॉल या मैसेज नहीं करती, शायद आपको लगता होगा कि मुझे आपकी याद नहीं आती लेकिन सच मानिए तो मैं आपके मैसेज और कॉल का इंतज़ार करती हूँ। मुझे तब ज़्यादा अच्छा लगता है जब यह पहल आप करते हैं। मैं चाहती हूँ कि जैसे मैं आपको याद करती हूँ वैसे ही आपको मेरी याद आए। आपके एक मैसेज पे मेरा मुरझाया चेहरा ऐसे खिल उठता है कि उस समय कोई भी मेरे सारे दाँत आसानी से गिन ले।

मुझे जब भी आपकी बहुत याद आती है मैं आपका पसंदीदा गाना सुनने लगती हूँ और उस गाने के एक-एक शब्द में मैं आपको महसूस कर पाती हूँ। उस वक्त मैं आपको अपने इर्द-गिर्द पाती हूँ। आप सचमुच बहुत मासूम हैं। मैं क्या कोई भी आपसे जुड़ जाएगा। मैं जब आपको देखती हूँ तो सोचने लगती हूँ कि अगर हर लड़के में ऐसी ही मासूमियत आ जाए तो लड़कियाँ निडर होकर रात में भी बाहर घूम सकें।

मैं आपसे कभी नाराज़ नहीं हो सकती चाहे आप मुझे कुछ भी कह दीजिए। वो तो कभी-कभी बस आपको परेशान करने के लिए नखरे दिखाती हूँ। मुझे पता है आप मुझसे गुस्सा नहीं हैं, आख़िर आप मेरे ही जैसे हैं। और अगर  गुस्सा हैं तो बस एक बार शुरू से वो सारी बातें याद कर लीजिए जो हमारे बीच हुई थीं, वो बातें याद कर लीजिए जिनपर हम एक साथ हँसे थे, यकीन मानिए उसके बाद आपका गुस्सा छू मंतर हो जाएगा। ना यकीन आए तो कर के देख लीजिए।

(मैंने सुना है कहने से प्रेम हल्का हो जाता है और इसीलिए मैंने ये सब बातें आपसे नहीं कहीं बल्कि लिखना ही ठीक समझा। बहुत सम्भव है कि मेरा ये लिखा आप तक कभी पहुँचे ही न लेकिन ये सारी बातें लिखकर मैं खुद को हल्का महसूस कर पा रही हूँ।)

सुप्रिया दुबे ©

नोट -  उपर्युक्त सभी बातें काल्पनिक हैं।


दिल ढूँढता है फिर वही...

चाँदनी रात है...आसमान में तारे भी आज साफ दिखाई दे रहे हैं। आज बहुत दिनों बाद पूरा परिवार छत पर एक साथ इकट्ठा हुआ है। बड़ा अच्छा लग रहा है सबको यूँ एक साथ देखकर। सब आपस में बातें कर रहे हैं। इधर मैं चटाई पर लेटे हुए धीरे-धीरे ग़ज़लें सुन रही हूँ।

“रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह...” ये ग़ज़ल बस अभी-अभी ख़त्म हुई है।

“बेचैन बहुत फिरना, घबराए हुए रहना...” अब यह ग़ज़ल बज रही है।

पहली बार में मुझे यह ग़ज़ल बहुत से थोड़ी कम पसन्द आई थी मगर आज जब दोबारा सुन रही हूँ तो बहुत से थोड़ी ज़्यादा पसन्द आ रही है। दरअसल, ग़ज़लों की एक ख़ासियत होती है कि आपको पहली बार में कोई ग़ज़ल उतनी पसन्द नहीं आती मगर जब आप उसे दोबारा सुनते हैं तो वही ग़ज़ल आपको अच्छी लगने लगती है।

जैसे-जैसे ग़ज़लें बदल रही हैं, मेरा मूड भी बदल रहा है। मैंने देखा है, ग़ज़लें सुनने का मन अक्सर शाम को करता है या फिर रात में, जब हमारा दिल फुर्सत में होता है। फुर्सत में ही हमें ‘उनकी’ याद भी आती है। वो ग़ज़ल भी तो है...

“दिन भर तो मैं दुनिया के धंधों में खोया रहा..जब दीवारों से धूप ढली, तुम याद आए...”

आज सुबह से ही लाइट कटी है। अभी भी लाइट नहीं है। मैं मन ही मन मना रही हूँ -

“भगवान करें हर दूसरे दिन ऐसे ही लाइट न रहे! कम से कम सब इकट्ठे तो होंगे इसी बहाने! कम से कम चारों ओर चकाचौंध तो नहीं होगी! चाँद और तारे तो साफ दिखाई देंगे!”

आप यकीन नहीं मानेंगे लेकिन आज जब लाइट नहीं है तब हवा भी जादे ठंडी लग रही है। लग रहा है जैसे रोज शहर की सारी लाइटें ही मिलकर हवा को गर्म बना देती थीं। सामने वाले के दरवाजे पर आज दो मोमबत्तियाँ अपने अस्तित्व पर इतराते हुए झूम-झूमकर जल रही हैं।

आज बहुत दिन बाद गाँव वाली फीलिंग आई है। मेरा गाँव नदी के किनारे है। रात में छत पर खूब ठंडी हवा चलती थी। चाँदनी रात में हम ऐसे ही छत पर खुले आसमान के नीचे सोते थे। सब आपस में खूब बातें करते थे। और इसी तरह सोए हुए मैं ‘साँवरिया’ फ़िल्म के गाने सुनती थी।

“गुमसुम चाँदनी हो, नाज़िनी हो, या कोई हूर हो?...”

“एक दिन आसमां से परी आएगी...”

और सुनते-सुनते परियों की कल्पनाएँ करने लगती थी। आसमान में बिखरे सफेद बादलों में आकृतियाँ खोजने लगती थी।

मुझे बचपन से ही गाने सुनना बहुत पसंद है। हम जब गाँव में थे तो वहाँ लाइट बहुत कम रहती थी। टीवी उतनी चलती नहीं थी, हम सुबह से लेकर रात तक ‘विविध-भारती’ सुनते रहते थे।

‘सखी-सहेली’, ‘हेलो फरमाइश’, ‘चित्रलोक’ और भी न जाने कितने ही प्रोग्राम आते थे।

इधर रेडियो बजता रहता था उधर हम अपना काम करते रहते थे। जब कभी रेडियो पर “दिल ढूँढता है...” गाना बजता तो मैं सोचने लगती कि एक समय आएगा जब हम गाँव से दूर होंगे, हमारे पास फुर्सत नहीं होगी, तब हमें यह समय याद आएगा...और आज मुझे वो फुर्सत के दिन  याद आ रहे हैं, छत पे गुज़ारी वो रातें याद आ रही हैं, मुझे मेरा गाँव याद आ रहा है।

मैंने फोन में वही गाना लगा दिया है... और आसमान की ओर देखते हुए मैं उन्हीं पुरानी यादों में खोए जा रही हूँ...

इधर धीरे-धीरे बज रहा है,

“दिल ढूँढता है, फिर वही, फुर्सत के रात-दिन...”

सुप्रिया दुबे ©

ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे

कहते हैं कि अच्छे दोस्त सिर्फ किस्मत वालों को ही मिलते हैं और इस मामले में मैं खुशकिस्मत रही हूँ। मुझे याद है मैं बहुत छोटी सी थी। भईया के साथ रोज शिशु मंदिर पढ़ने जाया करती थी। उस समय 'सप्तम' में थे और दीदी 'अष्टम' में। मेरे स्कूल में सप्तम और अष्टम कक्षा एक ही कमरे में चलती थी तो मैं हमेशा उसी कमरे में कभी भईया के पास जाकर बैठती, कभी दीदी के पास। आचार्य जी इस बात पर नाराज भी होते थे। करीब छः महीने ऐसे ही चलता रहा।

एक दिन भईया मुझे 'शिशु कक्षा' में ले गए। मैं बहुत डरी हुई थी। पहली शीट पर ही दो छोटी-छोटी लड़कियाँ बैठी थीं। दोनों जुड़वा बहनें लग रही थीं। वो दोनों किताब खोलकर कुछ पढ़ने की कोशिश कर रही थीं। भईया ने दोनों से उनका नाम पूछा। उनमें से एक ने जवाब दिया - "मेरा नाम संध्या, और इनका सौम्या"। फिर भईया मुझे समझाते हुए बोले  "देखो संध्या-सौम्या भी पढ़ रही हैं। तुम्हारे कितनी बड़ी ही तो हैं। देखो ये नहीं डर रही हैं। इन्हीं के साथ बैठकर पढ़ो।" अब तक मेरे मन में उन दोनों के प्रति काफी सम्मान की भावना जाग चुकी थी। मुझे अपने ऊपर थोड़ी शर्म आने लगी। वो दोनों थोड़ा किनारे खिसकीं और मैं उनकी ही शीट पर बैठ गई। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गाढ़ी होने लगी। हम हमेशा एक साथ रहते, एक साथ खेलते। टिफिन भी मिल बाँटकर खाते। जिस दिन वो दोनों पढ़ने नहीं आतीं, मेरा दिन बहुत मुश्किल से बीतता था।

बाद में मुझे पता चला कि वो दोनों जुड़वा बहनें नहीं थीं बल्कि संध्या, सौम्या से दो साल की बड़ी थी। इतनी छोटी उमर में ही दोनों के कान छिदे हुए थे। संध्या बता रही थी कि वो अपने मामा के वहाँ गई थी, नागपुर। वहीं उनके कान छिदवा दिए गए थे। वहाँ बचपन में ही लड़कियों के कान छेद दिए जाते हैं क्योंकि बचपन में लड़कियों के कान मुलायम होते हैं, छेड़ने पर जादे दर्द नहीं होता। मुझे भी कान छिदवाने का शौक लगता था लेकिन जब भी मैं मम्मी से इस बारे में बात करती, वो मना कर देती थीं और मेरे लिए चिपकाने वाला कान का टपस ले देती थीं और इस तरह हर बार मेरा ये शौक ठंडा पड़ जाता था।

हम तीनों पांचवीं तक वहीं पढ़े फिर मुझे अपना स्कूल बदलना पड़ गया। एक बालिका इंटर कॉलेज में मेरा दाखिला छठवीं क्लास में हो गया था। मैं उन सबसे दूर जाने पर दुखी थी लेकिन पहले ही दिन जैसे ही मैं कॉलेज के गेट से अंदर घुसी, मुझे सौम्या दिख गई। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा। लगा जैसे भगवान भी नहीं चाहते थे कि हम अलग हो जाएँ।

एक बार फिर हम साथ थे। एक ही कॉलेज में, एक ही क्लास में। मैं दसवीं तक उनके साथ उसी कॉलेज में पढ़ी। फिर मुझे दोबारा अपना स्कूल किसी कारणवश बदलना पड़ा। अब जिस कॉलेज में मेरा नाम था, मैं वहाँ बस नाममात्र पढ़ने गई। पूरे दो साल में बस एक बार। अच्छा ही नहीं लगता था मुझे उनके बिना। और ये कॉलेज उनके घर से काफी दूर था तो सवाल ही नहीं उठता था कि वो यहाँ इतनी दूर पढ़ने आतीं। उनकी पढ़ाई वहीं से चलती रही। लेकिन वो मेरे कोचिंग में ही पढ़ने लगी थीं। जिस कारण हमारा साथ एकदम से कभी नहीं टूटने पाया।

एक बार मैं उनकी दीदी की शादी में उनके घर भी गई थी और मुझे लगा ही नहीं कि मैं अपने घर नहीं थी। संध्या-सौम्या ने बचपन से ही मेरे बारे में अपने घर पर इतना कुछ बता दिया था कि उन लोगों के बर्ताव से मुझे लगा कि मैं सबको पहले से ही जानती थी। हालाँकि मुझे भी सबके बारे में पता था, बस मिली नहीं थी कभी। यही हाल मेरे घर पर भी था। बचपन से ही मैं जब स्कूल से आती तो मुझे कोई चाहिए होता था जिसे मैं दिन-भर उनके साथ कि गई मस्ती के बारे में बता सकूँ। कभी-कभी तो दीदी सुनते-सुनते परेशान हो जाती थी। जब मम्मी और दीदी पास बैठी रहती थीं तो मुझे जादे मेहनत नहीं करनी पड़ती थी लेकिन जब मम्मी काम कर रही होती थीं तब मुझे बारी-बारी से सब कहानी दोनों को सुनानी पड़ती थी।

संध्या-सौम्या भी मेरे घर कई बार आ चुकी हैं। पहले मैं उन्हें अपने घर लाने से डरती थी। मैंने कहीं सुन रखा था कि दोस्ती को बाहर तक ही सीमित रखना चाहिए, जब घर आना-जाना शुरू हुआ तो दोस्ती में दरार पड़ने लगती है। लेकिन अब विश्वास हो गया कि अगर दोस्त अच्छे हों और दोस्ती पक्की हो तो ऐसा कुछ नहीं होता। अब वो दोनों पढ़ने के लिए मुझसे थोड़ी दूर चली गई हैं। ऐसा पहली बार हुआ है जब हम एक साथ नहीं पढ़ रहे लेकिन अब तीनों के पास फोन है तो जब भी हमें एक-दूसरे की याद आती हम कॉल या वीडियो कॉल कर लेते हैं। कभी-कभी मिलना भी हो जाता है। लगता ही नहीं है कि हम दूर हैं। हम जब भी मिलते हैं तो लगता है अभी कल ही तो मिले थे।

हम बचपन से ही इतने करीब रहे हैं कि अगर आप हम तीनों से एक साथ मिलिए तो कह ही नहीं पाएँगे कि हम तीनों सगी बहनें नहीं हैं। हमारे व्यक्तित्व पर जाने-अनजाने एक-दूसरे का गहरा प्रभाव पड़ा है। हमारी पसंद, हमारे शौक भी काफी मिलते हैं। हमारे बीच एक अनुशासन है। हम कभी प्यार-मोहब्बत पर तो बात ही नहीं कर सकते। संध्या, वो तो मुझे अपनी बड़की दीदी लगती है। जरा सा भटको तो डपट देती है। और होना भी चाहिए, दोस्ती में अगर थोड़ा सा अनुशासन भी हो तो फिर अम्बुजा सीमेंट वाली मजबूती आ जाती है दोस्ती में।

संध्या काफी खुशमिजाज है। जब कुछ बोलेगी तो बातें कम, हँसी जादे सुनाई देगी। मैंने उससे हर परिस्थिति में हँसना सीखा है, हर समय पॉजिटिव रहना सीखा है। सौम्या, संध्या से गंभीर है। उम्र में छोटी है वो संध्या से, लेकिन बातों से वो ही बड़ी जान पड़ती है। दोनों आपस में जब भी थोड़ा सा झगड़ा करने की कोशिश करते, उनमें से कोई न कोई हँस ही देता है। काफी मिल-जुलकर रहते हैं दोनों और इसी लिए टीचर्स हमेशा से ही दोनों को जुड़वा समझते आए थे।

हम जब छोटे थे तो आए दिन हमारा झगड़ा भी हो जाता था लेकिन शाम होते-होते हम फिरसे एक हो जाते। फिर अपनी इस बचकानी हरकत पर हँसते। अब हमारा झगड़ा नहीं होता। मैं ही कभी-कभी उनको कॉल नहीं कर पाती मगर वो दोनों कभी गुस्सा नहीं होतीं। वो समझती हैं मुझे।

बचपन में जब हम शिशु मंदिर में थे, हमने सुना था कि अगर बड़ी वाली घास को पकड़कर दोस्त उसपे गाँठ लगा दें तो दोस्ती पक्की और परमानेंट हो जाती है। हमने भी ये बचकानी हरकत की थी। जो भी हो , हो सकता है नुस्खा काम कर गया हो।

हमें जीवन में कई लोग मिलते हैं लेकिन वो हमारे उतने करीब कभी नहीं आ पाते, जितने की हमारे बचपन के दोस्त। और ये बात सिर्फ़ वही समझ पाएँगे जिनके पास बचपन के दोस्त होंगे। लेकिन अगर आपके अंदर का बचपना जीवित है तो अब भी आपके बचपन जैसे पक्के दोस्त बन जाएँगे। बाकी संध्या-सौम्या और अपने लिए शुभकामनाएँ कि हमारी दोस्ती ऐसे ही मजबूत बनी रहे। हम अपने मार्ग से न भटकें, स्वस्थ रहें, मस्त रहें और अपने-अपने लक्ष्य को प्राप्त करें।

सभी दोस्तों को मित्रता दिवस की शुभकामनाएँँ...

जाते-जाते शोले फ़िल्म का वो गीत याद आ रहा है कि-
ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर, तेरा साथ ना छोड़ेंगे...

सुप्रिया दुबे ©