15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हो गया। देश का पुरुष वर्ग आज़ाद हो गया लेकिन देश की महिलाएँ, लड़कियाँ आज भी इक कैद में हैं, वे मजबूर हैं घरों में रहने के लिये। और उनकी इस कैद का ज़िम्मेदार है यह समाज। सबसे पहले तो खुद उनके ही घरवाले। जिनमें से कुछ तो बाहरी दुनिया को बेटियों के लिए असुरक्षित मानते हुए मजबूर हैं और कुछ रूढ़िवादिता से ग्रसित होने के कारण 'गैर जिम्मेदार' हैं। हमने एक ऐसा समाज बना दिया है जिसमें लड़कियों के मन में असुरक्षा का डर बैठ गया है।
आज कोविड-19 नामक वैश्विक महामारी के चलते पुरुष वर्ग भी महीनों से घरों में कैद है, यही समय है महसूस करने का कि कैसा लगता है लड़कियों को कैद में रहते हुए। आप तो 5 महीनों में ही उकता गए।
अब जरूरत है कि देश का हर पुरुष गुंजन सक्सेना जी के पिता की तरह सोचे, और अपने देश की बेटियों को “पिंजरा तोड़ के उड़ जाने” के लिए प्रेरित करे। जिस दिन यह समाज बेटियों को एक सुरक्षित परिवेश दे सकेगा, बेटियाँ आज़ाद होंगी, और सही मायने में तब जाकर हमारा पूरा देश आज़ाद होगा। जब तक देश का एक भी वर्ग कैद में है, हम देश को आज़ाद नहीं कह सकते।
~ सुप्रिया दुबे 🌸
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#GunjanSaxena
[ In frame - Flight Lieutenant Miss Gunjan Saxena, the only woman who served the country in The Kargil War, with her father, Mr. Anup Saxena ]
