सपना साकार हुआ

खुली तो पिछली रात देखा सपना याद आया।

“मैं किसी जगह से गुज़र रही थी। वहीं एक कमरा था, देखकर ही लगता था किसी लेखक का कमरा है। उसमें बड़ा सा बुकशेल्फ था जिसमें ढेरों क़िताबें रखी थीं। मैं भटकते हुए उस कमरे में पहुँची तो एकसाथ इतनी सारी क़िताबें देख ललचाई नज़रों से उन्हें निहारने लगी। तभी वहाँ खड़े एक लेखक जैसे व्यक्ति, जिनका चेहरा तो मुझे धुँधला ही दिख रहा था मगर ये लगा था कि ये अशोक जमनानी सर हैं, ने मेरे मन की बात भाँप ली और शेल्फ से निकालकर एक किताब मुझे दे दी। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।”

यह सपना कई दिनों तक मेरे दिमाग में चलता रहा। फिर एक दिन मैंने सोचा कि जिसके बारे में यह सपना था उसे बताया जाना चाहिए। मैंने सर को यह कहानी बताई। मैंने कहा - “सर! सपने में आपने मुझे एक क़िताब दी थी शायद वो 'स्वेटर' थी।” सर ने पूछा -  “आपने 'स्वेटर' पढ़ी है?” मैंने कहा “नहीं”। सर संवेदनशील हैं ही, उन्होंने मेरा एड्रेस लिया और मुझे यह किताब भेजने की बात कही।

कुछ ही दिनों बाद डाक से यह किताब मेरे हाथ में आयी। सपने के साकार होने पर जैसी खुशी होती है, ठीक वैसी ही खुशी हो रही थी मुझे।

परीक्षाओं के चलते मैं इसे पढ़ना टालती रही मगर जब परीक्षाएँ ख़ुद टलती गईं तो मैंने इसे पढ़ना शुरू किया। आज मैंने इस कहानी-संग्रह की आख़िरी कहानी पढ़ी।

आलोचना करने की समझ तो मुझमें नहीं है। इतना कहूँगी कि पढ़ने में मजा आया। इन कहानियों में से जो मुझे सबसे अधिक पसंद आईं वो हैं - 'अलग', 'स्वेटर', 'झुर्रियाँ' और 'परकम्मा वासिनी'। हर एक कहानी के शीर्षक का असल माने कहानी के आख़िर में समझ आता है। और यह बात आख़िर तक पहुँचने के दौरान उत्सुकता बनाए रखती है। 'परकम्मा वासिनी' के आख़िर में मेरी आँखों में नमी थी तो 'अलग' का आख़िरी हिस्सा पढ़कर हँसी आ गई।

'स्वेटर' को मैं जीवन भर इसलिए भी नहीं भूलने वाली हूँ क्योंकि यह पहली क़िताब थी जो मुझे ख़ुद उस किताब के लेखक ने भेजी।

कहते हैं सपने में वही लोग आते हैं जो आपके लिए मायने रखते हैं और वास्तव में मैं बचपन से (लगभग 8-9 साल से) सर के विषय में भईया से सुनती आयी हूँ। अख़बारों में सर के लेख पढ़ती रही हूँ। आज के दैनिक जागरण में निकला लेख भी मैंने पढ़ा। 'स्वेटर' पढ़ने के बाद आपकी बाकी किताबें पढ़ने का मन हो रहा है यदि सम्भव हो सका तो ज़रूर पढूँगी।

बहुत-बहुत धन्यवाद सर इस यादगार तोहफ़े के लिए !

हाँ, इस क़िताब की शुरुआत में आपकी लिखी एक कविता है, वो मुझे बहुत पसंद आयी, ये रही -

लिखना
कोई आदत नहीं
न कोई मजबूरी है मेरी
लिखना मुट्ठी भर सिक्कों के लिए
मंजूर नहीं मुझे
न बुनियाद होने की बेबसी
न कोई आलीशान कंगूरा मेरे ज़ेहन में है
बेख़ुदी नहीं ख़ुदाई भी नहीं
विसाल नहीं ज़ुदाई भी नहीं
तलाश नहीं
रास्ता नहीं
दर नहीं
आस्तां नहीं
पड़ाव नहीं कारवां नहीं
रहगुज़र बूढ़ी या कि फिर जवां भी नहीं
पाँव नहीं मंज़िल नहीं
धड़कन नहीं
दिल नहीं
वाज़ नहीं
नज़ीर नहीं
ख़्वाब नहीं
ताबीर नहीं
लिखना किसी पाने खोने पे
कहाँ फ़िदा ठहरा
लिखना
जर होने से
ज़ुदा ठहरा...






कहानी

चौराहों पर
जब मैं देखती हूँ भीड़ को,
भीड़ मुझे दिखती है
किसी कहानी-संग्रह की भाँति,
जिसमें हर एक शख़्स
एक कहानी है;
एक चलती-फिरती कहानी,
जिस शख़्स की कहानी
दर्ज़ कर देता है कोई लेखक, काग़ज़ों पर,
मरने से बच जाती है वह कहानी,
बाकी की कहानियाँ रह जाती हैं अनकही
जो तोड़ देती हैं दम
अपने कथानायक के मरने के साथ ही,
एक शख़्स में
इतना लेखक तो होना चाहिए
कि वह लिख सके
कम से कम
अपनी कहानी!

~ सुप्रिया दुबे © (१८/०६/२०२०)



गोविंद

दोस्त बनकर
वो आया था मेरी ज़िंदगी में
हुआ कब प्यार
ना उसको है ख़बर, ना ही मुझे

                                है वो 'गोविंद' मेरा
                               और मैं हो गयी हूँ राधा
                                हैं लेते बाँट हर ग़म
                                मिलके दोनों आधा-आधा

भटकती राह हूँ जब
मैं कभी अर्जुन की तरह
वो बनकर सारथी कृष्णा
है करता मार्गदर्शन

                                थोड़ा सा है वो नटखट
                                पर वो समझदार भी है
                                हँसाता है, रुलाता है
                                वो मेरा प्यार भी है

करूँ जो याद उसे
मैं हूँ मीरा, वो कन्हैया
करूँ जो प्रेम उसे
राधिका मैं, कृष्ण है वो

                                रहा वो एक ही हरदम
                                हैं बदले रूप मैंने
                                है मेरी कामना हो जाऊँ
                                रुक्मिणी अब मैं!

~ सुप्रिया दुबे (१९/०६/२०२०)

On behalf of my friend Govind's beloved...
Coz she wanted a poem based on their friendship on his birthday and today it is. I have tried my best to get into her feelings.

Happy Birthday Gobhiii...




Benjamin Franklin's Autobiography

Got it as Prize in Online "निबंध प्रतियोगिता". The book selection was up to me. And I chose this one, The autobiography Of Benjamin Franklin, which I wanted to read for a long time since I had listened about it from The Prime Minister in "Mann Ki Baat" 5-6 years ago when Barack Obama had visited India. Since then many people talked about it. They say it's the best book in autobiography genre. Let's see if they are true.

I had bought the Hindi Translation of the book from The Universal Booksellers, Lucknow. But that was hard to understand. Now I have the original one. Excited to read. Thanks to Dinkar Pustakalay to organize such a praiseworthy online contest. Thank you Mayank for this book.

There is a quote on the cover page of the book, which impressed me -

"Either write something worth reading or do something worth writing." ~ Benjamin Franklin.

~ Supriyaa Dubeyy



अपनी खूब जमेगी...

मैंने साल की शुरुआत में ही सोचा था कि इस साल पौधे लगाऊँगी। लॉकडाउन के चलते अब तक मेरा ये प्लान ताख पे धरा रहा, लेकिन आज जब किसी जरूरी काम से घर से बाहर निकलना हुआ तो लौटते समय मैंने रास्ते में ये तीन पौधे खरीद लिए। और फिर घर आकर इन्हें गमले में स्थापित कर दिया। घर के सामने वाले खेत से मिट्टी मिल गई और सामने वाले घर में गायें हैं तो वहाँ से मैंने पुराना गोबर इकट्ठा किया और उसे ही खाद के रूप में इस्तेमाल किया।

हमने गाँव वाले घर पे खूब सारे फूल-पौधे लगा रखे मगर पढ़ाई के सिलसिले में जबसे ख़लीलाबाद आना हुआ तबसे पौधों से दूरी सी बन गई थी लेकिन अब मेरे इस शौक ने एक बार फिर करवट ली है।

अब इन प्यारे दोस्तों की देख-रेख की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है। नज़रें हर ओर से हटकर इनके ऊपर ही खिंची जा रही हैं। मन को एक अलग ही सुकून मिल रहा है इन्हें देखकर। हालाँकि मैं इन्हें अपनी मनचाही जगहों पर नहीं रख पायी क्योंकि यहाँ बंदरों का बहुत आतंक है फिर भी ये जहाँ रखे हैं, सुंदर लग रहे हैं। जबसे ये घर में आये हैं मुझे हवा भी पहले से काफी शुद्ध लगने लगी है।

~ सुप्रिया दुबे




राग मल्हार

जब बादलों से झरती हैं बूँदें
पानी नहीं;
झरती हैं उलझनें, मेरे मन की,
ठंडी हवाओं की छुवन से
रोमांचित हो उठता है मेरा रोम-रोम,
वृक्षों की परछाईं-सा
झूमने लगता है मेरा मन,
और मेरी आत्मा करती है नृत्य
राग मल्हार की धुन पर!

© सुप्रिया दुबे


सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा

अब तक जब कभी कोई गाँधी जी को भला या बुरा कहता था तो मैं सुन के रह जाती थी। क्योंकि तब मैंने गाँधी जी को ज़रा भी पढ़ा-समझा नहीं था, ऐसे में उनके विषय में कुछ भी कहना उचित नहीं था। हाँ, लेकिन अब पढ़ लिया, अब जरूर कुछ बोल सकती हूँ। कुछ नहीं तो कॉलेज में अक्सर ही भाषण प्रतियोगिताएँ होती रहती हैं, जहाँ कभी गाँधी जी के प्रति अपने विचार रखने का मौका मिलेगा, वहाँ आज का पढ़ा काम आएगा। वैसे इस पुस्तक से बहुत कुछ सीखने को भी मिला जो मेरे जीवन में जरूर कहीं न कहीं काम आएगा।

यह पहली बार था जब मैंने किसी की आत्मकथा पढ़ी। आत्मकथा पढ़ने का सिलसिला बापू के "सत्य के प्रयोग" से शुरू हुआ, इससे बेहतर और क्या हो सकता है! आगे गाँधी जी से सम्बंधित और भी पुस्तकें पढ़ना चाहूँगी।

मेरा मानना है कि पाश्चात्य सभ्यता, साहित्य, या अन्य धर्म को पढ़ने-समझने से पहले अपनी सभ्यता, अपने यहाँ के साहित्य और अपने धर्म की किताबें पढ़ी-समझी जानी चाहिए। अब मैं खुद को विदेशी महापुरुषों की आत्मकथा पढ़ने के योग्य पाती हूँ। अब तक मैंने ज़्यादातर फिक्शन किताबें ही पढ़ीं, लेकिन अब जीवनी-आत्मकथा जैसी नॉन-फिक्शन क़िताबें भी पढ़ी जाएँगी। 'सत्य के प्रयोग' पढ़ने में मुझे कुल २० दिन लग गए जो कि मुझे नॉन-फिक्शन पढ़ते हुए लगते ही हैं। इसमें कुल ५०० पन्ने थे। इससे पहले 'द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल' पढ़ी थी, उसे पढ़ने में भी कुल २० दिन के करीब लगे थे। लेकिन उस किताब ने मेरे जीवन को खासा प्रभावित किया। इससे भी यही उम्मीद है। हालाँकि दोनों ही किताबें पढ़ने हुए काफी बोरियत महसूस हुई लेकिन इतना कुछ सीखने के लिए थोड़ा बोर होना चलता है।

~ सुप्रिया दुबे (१/६/२०२०)