सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा

अब तक जब कभी कोई गाँधी जी को भला या बुरा कहता था तो मैं सुन के रह जाती थी। क्योंकि तब मैंने गाँधी जी को ज़रा भी पढ़ा-समझा नहीं था, ऐसे में उनके विषय में कुछ भी कहना उचित नहीं था। हाँ, लेकिन अब पढ़ लिया, अब जरूर कुछ बोल सकती हूँ। कुछ नहीं तो कॉलेज में अक्सर ही भाषण प्रतियोगिताएँ होती रहती हैं, जहाँ कभी गाँधी जी के प्रति अपने विचार रखने का मौका मिलेगा, वहाँ आज का पढ़ा काम आएगा। वैसे इस पुस्तक से बहुत कुछ सीखने को भी मिला जो मेरे जीवन में जरूर कहीं न कहीं काम आएगा।

यह पहली बार था जब मैंने किसी की आत्मकथा पढ़ी। आत्मकथा पढ़ने का सिलसिला बापू के "सत्य के प्रयोग" से शुरू हुआ, इससे बेहतर और क्या हो सकता है! आगे गाँधी जी से सम्बंधित और भी पुस्तकें पढ़ना चाहूँगी।

मेरा मानना है कि पाश्चात्य सभ्यता, साहित्य, या अन्य धर्म को पढ़ने-समझने से पहले अपनी सभ्यता, अपने यहाँ के साहित्य और अपने धर्म की किताबें पढ़ी-समझी जानी चाहिए। अब मैं खुद को विदेशी महापुरुषों की आत्मकथा पढ़ने के योग्य पाती हूँ। अब तक मैंने ज़्यादातर फिक्शन किताबें ही पढ़ीं, लेकिन अब जीवनी-आत्मकथा जैसी नॉन-फिक्शन क़िताबें भी पढ़ी जाएँगी। 'सत्य के प्रयोग' पढ़ने में मुझे कुल २० दिन लग गए जो कि मुझे नॉन-फिक्शन पढ़ते हुए लगते ही हैं। इसमें कुल ५०० पन्ने थे। इससे पहले 'द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल' पढ़ी थी, उसे पढ़ने में भी कुल २० दिन के करीब लगे थे। लेकिन उस किताब ने मेरे जीवन को खासा प्रभावित किया। इससे भी यही उम्मीद है। हालाँकि दोनों ही किताबें पढ़ने हुए काफी बोरियत महसूस हुई लेकिन इतना कुछ सीखने के लिए थोड़ा बोर होना चलता है।

~ सुप्रिया दुबे (१/६/२०२०)