‘कुढ़न’ की आख़िरी कविता पढ़ी आज मैंने। इस कविता-संग्रह को पढ़ते हुए कभी संयोग शृंगार का रस मिलता है, कभी वियोग का तो कोई कविता पढ़ते हुए मन शांत सरोवर सा हो जाता है। देवेंद्र की कविताएंँ पढ़ते हुए ऐसी छोटी-छोटी बातों/भावनाओं पर ध्यान जाता है जिनपर हम अमूमन ध्यान नहीं दे रहे होते। जीवन के कई पहलू बिना महसूसे ही गुज़र जाते शायद, यदि मैंने ‘कुढ़न’ न पढ़ी होती।
देवेंद्र को मैं शुरू से पढ़ती आयी हूँ, संग्रह में संकलित कई कविताएँ पहले भी पढ़ी हैं मैंने और ये बड़ी बात है कि किसी को किसी की कविताएँ याद रह जाएंँ। बहुत सी कविताएँ नई-नई सी लगीं, जो पहली बार पढ़ीं मैंने। पहले से अब में बहुत सुधार हुआ है लेखनी में और सुधार की रफ्तार यूँ ही बनी रही तो एकदिन हिंदी काव्य के क्षेत्र में “देवेंद्र दाँगी” एक बड़ा नाम होगा।
‘कुढ़न’ में यूँ तो सारी ही कविताएँ अच्छी हैं लेकिन जो मुझे ख़ास पसन्द आईं वो हैं - ‘इस दरख़्त पर गौरैया रहती थी’, ‘चाह’, ‘तुम्हारी याद आती है’, ‘नफऱत’, ‘सातवाँ फेरा’, और ‘मृत्यु’।
देवेंद्र भाई को शुभकामनाएँ इतने सुंदर और सराहनीय कार्य के लिए कि उन्होंने अपनी कविताओं को इकट्ठा कर हमारे लिए उन्हें एक ही जगह पढ़ना सुलभ बना दिया। लेखन के क्षेत्र में उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ! आप द्वारा इससे भी बेहतर पढ़ने को मिलेगा इसी उम्मीद के साथ!
सुप्रिया दुबे
यदि आपने अबतक ‘कुढ़न’ न पढ़ी हो तो Amazon Kindle से ऑर्डर करके पढ़ लें।
देवेंद्र को मैं शुरू से पढ़ती आयी हूँ, संग्रह में संकलित कई कविताएँ पहले भी पढ़ी हैं मैंने और ये बड़ी बात है कि किसी को किसी की कविताएँ याद रह जाएंँ। बहुत सी कविताएँ नई-नई सी लगीं, जो पहली बार पढ़ीं मैंने। पहले से अब में बहुत सुधार हुआ है लेखनी में और सुधार की रफ्तार यूँ ही बनी रही तो एकदिन हिंदी काव्य के क्षेत्र में “देवेंद्र दाँगी” एक बड़ा नाम होगा।
‘कुढ़न’ में यूँ तो सारी ही कविताएँ अच्छी हैं लेकिन जो मुझे ख़ास पसन्द आईं वो हैं - ‘इस दरख़्त पर गौरैया रहती थी’, ‘चाह’, ‘तुम्हारी याद आती है’, ‘नफऱत’, ‘सातवाँ फेरा’, और ‘मृत्यु’।
देवेंद्र भाई को शुभकामनाएँ इतने सुंदर और सराहनीय कार्य के लिए कि उन्होंने अपनी कविताओं को इकट्ठा कर हमारे लिए उन्हें एक ही जगह पढ़ना सुलभ बना दिया। लेखन के क्षेत्र में उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ! आप द्वारा इससे भी बेहतर पढ़ने को मिलेगा इसी उम्मीद के साथ!
सुप्रिया दुबे
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