मुंशी प्रेमचंद जयंती।

मैंने अपने जीवन में जो सबसे पहला उपन्यास पढ़ा था...और पूरा पढ़ा था...वह था ग़बन। और कहीं न कहीं उसको पढ़ने के बाद से ही मैं एक किताबी कीड़ा बन गई। वहीं से मुझमें पढ़ने और कुछ रचने का शौक पनपा।
हम सब बचपन से ही अपनी कक्षाओं में मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़ते आ रहे हैं। और कहीं न कहीं हम सबका साहित्य से पहली बार परिचय वहीं पर हुआ था। जाने-अनजाने वहीं से हमारे अंदर साहित्य पढ़ने का शौक पनपा।
'हिंदी मीडियम' से पढ़ा शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो 'हामिद' को न जानता हो। और कोई कहानी याद हो न हो, बचपन में पढ़ी 'ईदगाह' हमें आज भी याद है।
मेरे लिए मुंशी प्रेमचंद की जगह कोई और नहीं ले सकता। वही थे जिन्हें मैंने पहली बार पढ़ा...पढ़ा ही नहीं बल्कि समझा। और अवधेश सर कहते थे कि समझा हुआ जीवन भर नहीं भूलता।
आज सिर्फ़ "नई वाली हिंदी" पढ़ने के चक्कर में कहीं न कहीं हम अपनी पुरानी धरोहर को भूल रहे हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि "नई वाली हिंदी" के लेखक भी पुरानी वाली हिंदी को पढ़कर ही इस मुकाम तक पहुँचे हैं। और हिंदी तो हिंदी है... तो फिर ये नई-पुरानी वाली बात कहाँ से आ गई? हमें तो सिर्फ़ हिंदी पढ़ना है, फिर चाहे वो नई हो या पुरानी। दोनों को समान रूप से पढ़ना है।
"कलम के सिपाही" को मेरा प्रणाम।
आज प्रेमचंद जी के जन्मदिन पर निकल रही हूँ " वरदान" के साथ एक नए सफ़र पर। लौटने के बाद मिलती हूँ आप सबसे।
शुभ रात्रि!

आसमाँ पिघलने लगा

सावन का पहला दिन था। आसमान में काले बादल उमड़ रहे थे। लग रहा था तेज बारिश होने वाली थी। चारों ओर अंधेरा छा रहा था। देखते ही देखते मूसलाधार वर्षा होने लगी। मैं बरामदे में कुर्सी पर बैठी तुम्हारे बारे में सोच रही थी। बारिश इतनी तेज थी कि पानी की फुहारें मेरे ऊपर तक आ रही थीं। हवा के ठंडे झोंकों की छुवन में मैं तुम्हें महसूस कर पा रही थी।

पता नहीं क्यों, जब बारिश होती है तो तुम्हारी बहुत याद आती है। नहीं, ऐसा नहीं है कि बाकी समय नहीं आती लेकिन जब बारिश होती है तो कुछ ज्यादा ही...। शायद तुम्हें भी बारिश के समय मेरी याद आती होगी!

पता है? कबसे बादल घुमड़ रहे थे लेकिन बारिश नहीं हो रही थी, तभी मैं बरामदे में आई और तुम्हें याद करते हुए उन घुमड़ते बादलों को एकटक देखने लगी। और देखते ही देखते आसमाँ पिघलने लगा। मुझे लगा जैसे मैंने तुम्हें याद किया इसीलिए बादल आसानी से बरस पाए। हाँ! वर्षा प्रेम की ऋतु है ना! शायद इसीलिए।

मानो बूँदों के रूप में आसमान धरती पर अपना प्यार लुटाता है और धरती शर्म के मारे धानी चूनर ओढ़ लेती है। चारों ओर प्रकृति हँसती हुई सी नज़र आती है। पेड़ कैसे झूमते हैं जब बारिश होती है!

साल भर आसमान वाष्प के रूप में धरती से उसकी यादें सोखता है और जब विरह असहनीय हो जाता है तो आसमान रो पड़ता है और तब धरती को तसल्ली होती है कि आसमान उसे भूला नहीं है। जब मैंने तुम्हें याद किया तो आसमान कैसे फूट-फूटकर रोने लगा था!

मुझे लगता है जिस जगह प्रेमी और प्रेमिका एक-दूसरे को ज़्यादा याद करते हैं, उस जगह बारिश ज़्यादा होती है। जहाँ बारिश के समय दोनों एक साथ एक-दूसरे को याद करते हैं वहाँ बारिश के बाद इंद्रधनुष निकलता है। शायद जिस जगह बाढ़ अधिक आती है उस जगह प्रेमी-प्रेमिकाओं की संख्या ज्यादा होती है। सूखे से होने वाली मौतों के जिम्मेदार उस जगह के प्रेमी-प्रेमिका होते हैं।

   सुप्रिया दुबे ©
(सन्त कबीर नगर)


अक्टूबर जंक्शन : समीक्षा

कहा जाता है कि दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत घटनाएँ धोखे से ही घटती हैं। ऐसा ही कुछ कल मेरे साथ हुआ। एक महीने पहले “अक्टूबर जंक्शन” मँगाए थे पढ़ने के लिए लेकिन अत्यधिक व्यस्तता और गर्मी के कारण पढ़ नहीं पा रहे थे। कल ऐसे ही किताब उठा के पन्ने उलटने-पलटने लगे। हालाँकि गर्मी अधिक थी, मन नहीं था पढ़ने का लेकिन जैसे ही एक पन्ना पढ़े बस पढ़ते ही चले गए। अगले चौबीस घंटे के अंदर पूरी किताब पढ़कर ख़त्म।

असल में अक्टूबर जंक्शन कि कहानी ही कुछ ऐसी है कि "आगे क्या होगा" यह जानने कि जिज्ञासा पूरी किताब पढ़ते वक़्त बनी रहती है और इसी चक्कर में आप किताब पढ़ते चले जाते हैं।

वैसे तो दिव्य भईया की कोई किताब पहली बार पढ़े लेकिन काफी अपनापन सा लगा। किताब में लिखी लगभग सब बातों से सहमति बन रही थी। लगभग हर चौथे पन्ने पर कुछ ऐसा मिल ही जाता जिसे अंडरलाइन करने की जरूरत महसूस होती। कुछ बातें ऐसी रहीं जो कभी नहीं भूलेंगी। जिनमें जीवन की “फिलॉसफी” छिपी थी। बहुत सी बातें सीखने लायक थीं। ऐसी ही किताबों के लिखे जाने की जरूरत है जो मनोरंजन करने के साथ कुछ सीख भी दे जाएँ।

आज के समय में जहाँ लोगों को प्यार के मायने तक नहीं पता, वहीं यह किताब हमें प्यार का असल मतलब समझाती है और बताती है कि कैसे दूर रहकर भी हम एक-दूसरे से सच्चा प्यार कर सकते हैं, जरूरत के समय उसकी मदद कर सकते हैं।

कहानी बनारस से शुरू होती है जहाँ चित्रा और सुदीप धोखे से एक-दूसरे से मिलते हैं और दुनिया की एक खूबसूरत प्रेम कहानी बनती चली जाती है। चित्रा और सुदीप की यह कहानी हर किसी के पढ़ने लायक है ख़ासकर कि लव स्टोरी में रुचि रखने वाले लोगों के लिए। कहीं कोई अश्लीलता नहीं है।

कुल मिलाकर मजा आया पढ़ने में। इसको पढ़ने के बाद अब दिव्य भईया की बाकी बची किताबें पढ़ने का भी मन हो रहा। पढ़ते हैं सब बारी-बारी से। आपलोग भी पढ़िए “अक्टूबर जंक्शन”, अच्छी किताब है और जो लोग पढ़ लिए हैं वो लोग दुबारा पढ़ लीजिए और हाँ, साथ में एक पेंसिल या हाईलाइटर भी रखिएगा क्योंकि कई जगह अंडरलाइन करने की जरूरत पड़ेगी।

दिव्य भईया से विनम्र अनुरोध कि ऐसे ही अच्छी-अच्छी किताबें लिखते रहें, हम पढ़ते रहेंगे। आगामी पुस्तकों के लिए शुभकामनाएँ और इंतजार।

 सुप्रिया दुबे ©
(सन्त कबीर नगर)


बारिश, बन्दर और प्रेम कबूतर

कल मैंने पहली बार अमेजन से कोई किताब खुद ऑर्डर कर के मँगाई। डिलिवरी वाला भीगते हुए किताब पहुँचाने आया था। पिछले दो-तीन दिन से लगातार बारिश हो रही है लेकिन जब मैंने ऑर्डर किया था तो मौसम बिल्कुल साफ था। मैंने नहीं सोचा था कि मेरी वजह से किसी को भीगना पड़ेगा। वैसे किताब अच्छी है- प्रेम कबूतर। मानव कौल लिखते हैं कि प्रेम आदमी को कबूतर बना देता है। अगर वाकई ऐसा है तो मैं भी कबूतर बनना चाहूँगी। कम से कम उड़ तो सकूँगी।
                  मुझे किताबें पढ़ना बहुत अच्छा लगता है और जब वह किताब मैंने खुद मँगाई हो तो और भी ज्यादा। इस किताब में लिखी साधारण बातों पर भी हँसी आती है या शायद मैं इसलिए ज्यादा हँसती हूँ ताकि घरवालों को ये न लगे कि इसने किताब के पैसे डुबा दिए। किताबें हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं, ख़ासतौर से मेरे जैसे अंतर्मुखी लोगों की, जिनके साथ हम हँस सकते हैं, समय बिता सकते हैं।
                  आज बरामदे में बैठी यही "प्रेम कबूतर" पढ़ रही थी। बाहर तेज बरसात हो रही थी। सामने के एक खेत में लबालब पानी भरा है तो कुछ बन्दर पास के ही अमरूद के पेड़ों पर चढ़कर पानी में छलाँग लगा रहे थे और बार-बार यही क्रिया दुहराई जा रही थी। तभी बन्दर के एक छोटे बच्चे ने शायद अपनी माँ से पानी में छलाँग लगाने की इच्छा जाहिर की लेकिन उसकी माँ ने उसके छोटे कद के चलते उसे ऐसा करने से मना कर दिया। शायद इस बात से बच्चे के बालमन पे ठेस पहुँची थी और उसने पेड़ से छलाँग लगा दी लेकिन अपने छोटे कद के चलते वो पानी तक नहीं पहुँच सका बल्कि नीचे ही मेंढक की तरह पसर गया। चोट तो लगी ही होगी उसे लेकिन झट से वापस अपनी माँ के पास पहुँच गया। तब उसे पहली बार एहसास हुआ था कि हमारे बड़े हमेशा उचित सलाह देते हैं। क्या करे उसकी भी क्या गलती थी! जीवन की पहली बारिश देखी थी उसने और बच्चों में तो बड़ा होने की काफी जल्दी होती ही है।
        किताब पढ़ते हुए मेरा ध्यान बार-बार बारिश में भीग रहे उन बंदरों की ओर जा रहा था। कुछ एक दूसरे को दौड़ा रहे थे। कुछ वही मटमैला पानी पी रहे थे। कुछ छोटे बन्दर पानी में तैर रहे थे। कुछ बस पेड़ पे चढ़ते और छलाँग लगाते। कितने स्वछंद थे वो! अपने में ही मस्त! उन्हें देखकर मुझे पहली बार एहसास हुआ था कि पढ़ाई से ध्यान भटकना भी इतना ख़ूबसूरत हो सकता है।
सुप्रिया दूबे ©

कर्त्तव्यबोध

जानते हैं? शुरू से ही मेरी एक कमी रही है... मैं किसी के प्रति अपनी भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाती। मैं नहीं जता पाती कि मैं उससे कितना प्यार करती हूँ। लेकिन मैं कुछ कहती भले नहीं हूँ, पर सब समझती हूँ। क्या मुझे नहीं दिखता मेरे मम्मी-पापा मेरे लिए कितनी मेहनत करते हैं? मेरी मम्मी सुबह 5 बजे से लेकर रात के 12 बजे तक जगती हैं। दिनभर काम करती रहती हैं। बिना हमको खिलाए वो खाना तक नहीं खातीं।
            इस उम्र में भी मेरे पापा रोज 26 किलोमीटर दूर मोटरसाइकिल चलाकर काम पर जाते हैं... यानि दिन भर में 52 किलोमीटर। क्या उनको थकान नहीं लगती होगी? क्या उनका मन नहीं करता होगा कि आज आराम कर लें, न जाएँ काम पर? आख़िर किसके लिए? हमारे लिए ही ना? साल-साल भर बीत जाता है वो अपने लिए एक शर्ट तक नहीं बनवाते। महीनों से घिसी हुई चप्पल पहन रहे हैं। क्यों? सिर्फ इसीलिए न ताकि अपनी जरूरतों से पहले वे हमारे 'शौक' पूरे कर सकें? हमारे लिए 10 हजार का फ़ोन खरीद सकें?
         ...और सिर्फ मेरे माता-पिता ही नहीं, दुनिया के हर माता-पिता अपने बच्चों के लिए इसी तरह मेहनत करते हैं, चिंता करते हैं।
          यूँ तो जल्दबाजी मुझे पसंद नहीं... मगर जब मैं उनके बारे में सोचती हूँ तो मन करता है कितनी जल्दी अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊँ! कितनी जल्दी उनके सपनों को और उन सपनों को जो मैंने उनके लिए देखे हैं, उन्हें पूरा कर पाऊँ!
        दोस्तों जिंदगी बहुत छोटी है, बिल्कुल मुट्ठी में बंद रेत की तरह। कब समय बीत जाता है पता ही नहीं चलता। मेरी और आपकी उम्र हो सकता है कम हो लेकिन हमारे माता-पिता उम्रदराज हो चुके हैं। हमारे पास वक़्त है अभी अपने सपनों को पूरा करने के लिए लेकिन उनके सपने अब हमसे हैं... इसलिए हमें जल्द ही कुछ करना होगा ताकि हम उन्हें अधिक से अधिक खुशियाँ दे पाएँ, उनके सपनों को पूरा कर पाएँ।
         जानते हैं उन्हें सबसे अधिक खुशी कब होगी? जब वे हमें हमारे सपनों को पूरा करते हुए देखेंगे, जब वे हमें सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते देखेंगे इसलिए जी-जान लगाकर पढ़िए। जो भी कर रहे हों पूरी मेहनत से करिए। जीवन में जो भी करना है जल्दी करिए क्योंकि आपकी सफलता का इंतजार आप से अधिक उन्हें है।
सुप्रिया दूबे ©
(तस्वीर में मम्मी और पापा)

याद तुम्हारी आई

सूर्य हुआ अस्ताचलगामी,
स्मृति-पटल पर उठी सुनामी;
हवा जब चली ठंडी-ठंडी,
हृदय हो उठा मस्त-मलंगी;
पक्षी उड़े नीड़ को अपने,
बादल ने तब ली अँगड़ाई;
लाल हो गया आसमान जब,
मिटने लगी सभी परछाई;
दिये जले तब आँगन-आँगन,
चारों ओर खामोशी छाई;
साँझ का तारा दिखा गगन में,
मुझको याद तुम्हारी आई!
-- सुप्रिया दूबे ©
PC - वाह रे हम!