जब मम्मी माथे पर चँदा बनाती थी,
मुझे नींद न आने पर वो थपकी दे सुलाती थी,
वो रात भर जगती थी कि मैं आराम से सोऊँ,
भले ही उसकी नींद अधूरी रह जाती थी,
याद आती हैं वो बचपन की बातें...
पापा का ऐनक पहन मैं खूब इतराती थी,
कुछ शब्दों को बोलने में जबान लड़खड़ाती थी,
वो मेरा खाना खाने में नखरे करना,
और मम्मी का “ये मामा का कौर,ये चाचा का और ये पापा का” कहकर खिलाना,
याद आती हैं वो बचपन की बातें...
वो बारिश की बूँदों में खुद को भिगाना,
बहते हुए पानी में कश्ती पौंराना,
वो गुड्डे और गुड्डी की शादी रचाना,
आँधी में बाग में आम बीनने जाना,
याद आती हैं वो बचपन की बातें...
वो दोस्तों के साथ में ‘आइस पाइस’ खेलना,
पुआल के ढेर में साँस रोके खुद को छुपाना,
बार-बार ‘ब्योमकेश बक्शी’ बनना,
सर पर धप्पे खा रुआँसा हो जाना,
और मुजरिमों के छिपते ही घर भाग जाना,
याद आती हैं वो बचपन की बातें...
जपरकाश काका का कहानियाँ सुनाना,
वो सावन में पोखरे पर गुड़िया पीटने जाना,
किसनौता फूवा का कजरी गाना,
और साथ में मेरा भी सुर में सुर मिलाना,
याद आती हैं वो बचपन की बातें...
वो पंजीरी खाकर के फुफ्फा बोलना,
वो उलझनों से दूर अपनी ही धुन में रहना,
वो ठण्डी में कउड़े में आलू भून खाना,
दिवाली के दीयों से तराजू बनाना,
याद आती हैं वो बचपन की बातें...
- सुप्रिया दुबे ©