यह कहानी है 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के फलस्वरूप भड़के सिख दंगों के दौरान दो लोगों के बीच पनपते प्रेम की। यह कहानी है ऋषि और मनु की। यह कहानी है 'बोकारो' शहर के उन तमाम सिखों की जो इन दंगों के दौरान नफ़रत के शिकार हो जाते हैं और अपना शहर छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। यह कहानी सुनाता है खुद 'बोकारो' शहर जो इन तमाम घटनाओं का गवाह बना।
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'चौरासी' थोड़ी वास्तविकता, थोड़ी कल्पना को खुद में समेटे अपने पात्रों को जीवंत बना देता है। पंजाबी बोली की मिठास घोले यह क़िताब साबित करती है कि लेखक ने इसे लिखने से पहले इस विषय पर काफी शोध किया है। क़िताब की आधी कहानी मुख्यतः ऋषि और मनु के प्रेम पर आधारित है बाकी का आधा हिस्सा दंगों और प्रेम को साथ लिये चलता है। मनोरंजन के साथ-साथ इस क़िताब से कुछ सीखा भी जा सकता है। क्या सीखा जा सकता है यह जानने के लिए आपको इसे पढ़ना होगा।
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मेरे द्वारा पढ़ी गयी यह @satyavyas11 भैया की दूसरी क़िताब है। उनकी पहली क़िताब जो मैंने पढ़ी थी, वह थी 'दिल्ली दरबार', लेकिन पता नहीं क्यूँ मैं उसे अब तक पूरा नहीं पढ़ पायी हूँ। उसकी अपेक्षा मुझे 'चौरासी' काफी बेहतर लगी। मैंने इसे 8 से 9 घण्टों के अंदर पूरा पढ़ लिया। मैंने जो पढ़ा वह इस क़िताब का पहला संस्करण है और इसमें कुछ मात्रात्मक त्रुटियाँ भी हैं। उम्मीद है कि आने वाले संस्करणों में इनमें सुधार किया जाएगा।
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दरअसल, यह क़िताब मैंने एक मित्र से उधार लेकर पढ़ी है। अब मुझे उसे यह वापस करनी पड़ेगी। बड़े दुःख की घड़ी होगी वह मेरे लिए क्योंकि कोई भी किताब पढ़ लेने के बाद मुझे उस क़िताब से लगाव हो जाता है। मैं उसे हरदम के लिए अपने पास रखना चाहती हूँ। ख़ैर, अब प्रयास करूँगी कि कोई भी क़िताब खुद खरीद कर पढूँ ताकि वह हमेशा के लिए मेरे पास ही रह जाए।
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'चौरासी' की एक पंक्ति जो मुझे सबसे प्यारी लगी -
"प्रेम हर मज़हब का एक अंग है जबकि इसे खुद ही एक मज़हब होना था।"
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My Rating 4.5/5*
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सुप्रिया दुबे ©
