इस महीने लखनऊ जाना हुआ। भाई की शादी में। फिर क्या! रस्मों से समय निकालकर हम निकल पड़े घूमने।
हमने uber बुक किया और सबसे पहले हम पहुँचे अम्बेडकर पार्क। जहाँ घूमते-घामते, फोटो खिंचवाते 2-3 घण्टे बीत गए। वो बड़े-बड़े हाथी, चमकीला फर्श, जरा सा ध्यान भटका कि गिरे धड़ाम से! अगर आपने "सुनो ना संगमरमर" गाने का वीडियो देखा होगा तो आप पहचान जाएँगे कि उस गाने के कुछ हिस्सों की शूटिंग यहीं हुई थी। ना देखा हो तो अबसे देखिएगा! मैंने वहाँ से लौटकर घर आने के बाद ये गाना दोबारा देखा तो उछल पड़ी। कि ये तो वही जगह है जहाँ पे मैंने कमर पे हाथ रख के फोटो खिंचवाया था। कुल मिलाकर बड़ा मजा आया घूमने में। पार्क के बीचों-बीच किले नुमा बनावट थी जिसके ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थीं। वहाँ लाल अक्षरों में चेतावनी लिखी हुई थी कि "दीवारों पर लिखने पर 500 रुपया अर्थदण्ड लगाया जाएगा" लेकिन up के आशिक़ दिल के बीच से तीर निकालकर उसमें "गुड्डू संग पिंकी" लिखने से कहाँ बाज आने वाले हैं! किले के अंदर अम्बेडकर साब और बहन सुश्री मायावती जी की भव्य प्रतिमाएँ बनी हुई थीं। कहीं अम्बेडकर जी संविधान लिख रहे थे तो कहीं राजेन्द्र बाबू को संविधान पकड़ा रहे थे।
वहाँ घूम लेने के बाद हमने दोबारा uber बुलाया और अबकी बार "नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान" उतरे। मुख्य गेट पर बड़े बड़े अक्षरों में उद्यान का नाम लिखा हुआ था और उसके ऊपर शेर का मुँह बना हुआ था। हमने टिकट लिया और गेट के अंदर घुसते ही पानी की बोतल पर एक पर्ची चिपकवानी पड़ी और उन्हें 20 रुपये पकड़ाने पड़े। शर्त यह थी कि अगर घूमकर वापस लौटने पर भी हमारे हाथ में बोतल रही तो रुपये हमें वापस कर दिए जाएँगे। हमने पैसे दिए और अंदर घुस गए। अंदर घुसते ही फव्वारे, फूल अजगर, सांप, मछली, बाघ और भी न जाने कितने ही जीव-जंतु उद्यान की शोभा बढ़ा रहे थे। उद्यान के बीच में कहीं-कहीं रेस्टुरेंट्स भी थे और रास्तों के किनारे यात्रियों के बैठने के लिए बेंच भी लगी हुई थी। इतने बड़े पार्क में घूमते हुए हमें 3-4 बार बेंच पर बैठकर सुस्ताना पड़ा। उद्यान के बीच "राज्य संग्रहालय" भी था जहाँ हम 5:05 बजे पहुँचे जो कि हमारे वहाँ पर पहुँचने के 5 मिनट पहले बंद हो चुका था। इस तरह हमें एक और बहाना मिल गया दोबारा इस उद्यान में आने का।
घूमते-घामते शाम हो गई और हम वापस लौटे। अगले दिन, जैसा कि भईया ने मुझसे वादा किया था कि वो मुझे किसी पुस्तकालय में घुमाएंगे। तो हमने "Universal Booksellers" को चुना और uber करके वहाँ पहुँचे। पहली बार मैंने एक साथ इतनी सारी किताबें देखी थीं। मैंने पहले से ही खरीदी जाने वाली किताबों की लिस्ट बनाई थी तो मैं वाजपेयी जी से किताबों के नाम बताती गई और वो मुझे किताबें पकड़ाते गए। वाजपेयी जी ने अपना पूरा नाम तो नहीं बताया लेकिन उतने ही देर में वे हमसे काफी-घुल मिल गए। उन्होंने मुझे "मृत्युंजय" और "ययाति" जैसी कुछ किताबें पढ़ने की सलाह भी दी। हमारे पास पैसे सीमित थे और हमें अपनी लिस्ट की किताबें भी लेनी थीं तो हमने वो किताबें अगली बार के लिए लिस्ट कर लीं।
वहाँ "नयी वाली हिंदी", पुरानी वाली हिंदी से लेकर इंग्लिश की लगभग सारी किताबें मौजूद थीं। जो किताबें मुझे नहीं लेनी थीं, मैं वो किताबें भी पूछती थी, यह देखने के लिए कि देखें इनके पास हैं कि नहीं। और जितनी भी किताबों का नाम मैं ले रही थी, एक-दो को छोड़कर सारी वहाँ मौजूद थीं। इधर मैं फिक्शन कॉर्नर देख रही थी, उधर भईया राजनीति की किताबें। गए थे मेरे लिए किताबें लेने लेकिन मुझसे ज़्यादा किताबें उन्होंने ही खरीद लीं।
सच कहती हूँ, वहाँ से आने का मन ही नहीं कर रहा था। मेरा बस चलता तो वहाँ की सारी किताबें अपने साथ लेते आती।
तो ऐसी रही हमारी लखनऊ यात्रा। यादगार, ख़ूबसूरत। मेरे लिए साल 2020 बहुत कुछ नया लेकर आया। जैसे कि मैं पहली बार लखनऊ घूमने गई थी। पहली बार घर से इतनी दूर। पहली बार कोई चिड़ियाघर देखी। पहली बार ट्रेन और uber में बैठी। और भी बहुत कुछ...
शुक्रिया 2020!
~ सुप्रिया दुबे ©
हमने uber बुक किया और सबसे पहले हम पहुँचे अम्बेडकर पार्क। जहाँ घूमते-घामते, फोटो खिंचवाते 2-3 घण्टे बीत गए। वो बड़े-बड़े हाथी, चमकीला फर्श, जरा सा ध्यान भटका कि गिरे धड़ाम से! अगर आपने "सुनो ना संगमरमर" गाने का वीडियो देखा होगा तो आप पहचान जाएँगे कि उस गाने के कुछ हिस्सों की शूटिंग यहीं हुई थी। ना देखा हो तो अबसे देखिएगा! मैंने वहाँ से लौटकर घर आने के बाद ये गाना दोबारा देखा तो उछल पड़ी। कि ये तो वही जगह है जहाँ पे मैंने कमर पे हाथ रख के फोटो खिंचवाया था। कुल मिलाकर बड़ा मजा आया घूमने में। पार्क के बीचों-बीच किले नुमा बनावट थी जिसके ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थीं। वहाँ लाल अक्षरों में चेतावनी लिखी हुई थी कि "दीवारों पर लिखने पर 500 रुपया अर्थदण्ड लगाया जाएगा" लेकिन up के आशिक़ दिल के बीच से तीर निकालकर उसमें "गुड्डू संग पिंकी" लिखने से कहाँ बाज आने वाले हैं! किले के अंदर अम्बेडकर साब और बहन सुश्री मायावती जी की भव्य प्रतिमाएँ बनी हुई थीं। कहीं अम्बेडकर जी संविधान लिख रहे थे तो कहीं राजेन्द्र बाबू को संविधान पकड़ा रहे थे।
वहाँ घूम लेने के बाद हमने दोबारा uber बुलाया और अबकी बार "नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान" उतरे। मुख्य गेट पर बड़े बड़े अक्षरों में उद्यान का नाम लिखा हुआ था और उसके ऊपर शेर का मुँह बना हुआ था। हमने टिकट लिया और गेट के अंदर घुसते ही पानी की बोतल पर एक पर्ची चिपकवानी पड़ी और उन्हें 20 रुपये पकड़ाने पड़े। शर्त यह थी कि अगर घूमकर वापस लौटने पर भी हमारे हाथ में बोतल रही तो रुपये हमें वापस कर दिए जाएँगे। हमने पैसे दिए और अंदर घुस गए। अंदर घुसते ही फव्वारे, फूल अजगर, सांप, मछली, बाघ और भी न जाने कितने ही जीव-जंतु उद्यान की शोभा बढ़ा रहे थे। उद्यान के बीच में कहीं-कहीं रेस्टुरेंट्स भी थे और रास्तों के किनारे यात्रियों के बैठने के लिए बेंच भी लगी हुई थी। इतने बड़े पार्क में घूमते हुए हमें 3-4 बार बेंच पर बैठकर सुस्ताना पड़ा। उद्यान के बीच "राज्य संग्रहालय" भी था जहाँ हम 5:05 बजे पहुँचे जो कि हमारे वहाँ पर पहुँचने के 5 मिनट पहले बंद हो चुका था। इस तरह हमें एक और बहाना मिल गया दोबारा इस उद्यान में आने का।
घूमते-घामते शाम हो गई और हम वापस लौटे। अगले दिन, जैसा कि भईया ने मुझसे वादा किया था कि वो मुझे किसी पुस्तकालय में घुमाएंगे। तो हमने "Universal Booksellers" को चुना और uber करके वहाँ पहुँचे। पहली बार मैंने एक साथ इतनी सारी किताबें देखी थीं। मैंने पहले से ही खरीदी जाने वाली किताबों की लिस्ट बनाई थी तो मैं वाजपेयी जी से किताबों के नाम बताती गई और वो मुझे किताबें पकड़ाते गए। वाजपेयी जी ने अपना पूरा नाम तो नहीं बताया लेकिन उतने ही देर में वे हमसे काफी-घुल मिल गए। उन्होंने मुझे "मृत्युंजय" और "ययाति" जैसी कुछ किताबें पढ़ने की सलाह भी दी। हमारे पास पैसे सीमित थे और हमें अपनी लिस्ट की किताबें भी लेनी थीं तो हमने वो किताबें अगली बार के लिए लिस्ट कर लीं।
वहाँ "नयी वाली हिंदी", पुरानी वाली हिंदी से लेकर इंग्लिश की लगभग सारी किताबें मौजूद थीं। जो किताबें मुझे नहीं लेनी थीं, मैं वो किताबें भी पूछती थी, यह देखने के लिए कि देखें इनके पास हैं कि नहीं। और जितनी भी किताबों का नाम मैं ले रही थी, एक-दो को छोड़कर सारी वहाँ मौजूद थीं। इधर मैं फिक्शन कॉर्नर देख रही थी, उधर भईया राजनीति की किताबें। गए थे मेरे लिए किताबें लेने लेकिन मुझसे ज़्यादा किताबें उन्होंने ही खरीद लीं।
सच कहती हूँ, वहाँ से आने का मन ही नहीं कर रहा था। मेरा बस चलता तो वहाँ की सारी किताबें अपने साथ लेते आती।
तो ऐसी रही हमारी लखनऊ यात्रा। यादगार, ख़ूबसूरत। मेरे लिए साल 2020 बहुत कुछ नया लेकर आया। जैसे कि मैं पहली बार लखनऊ घूमने गई थी। पहली बार घर से इतनी दूर। पहली बार कोई चिड़ियाघर देखी। पहली बार ट्रेन और uber में बैठी। और भी बहुत कुछ...
शुक्रिया 2020!
~ सुप्रिया दुबे ©
