कहते हैं कि अच्छे दोस्त सिर्फ किस्मत वालों को ही मिलते हैं और इस मामले में मैं खुशकिस्मत रही हूँ। मुझे याद है मैं बहुत छोटी सी थी। भईया के साथ रोज शिशु मंदिर पढ़ने जाया करती थी। उस समय 'सप्तम' में थे और दीदी 'अष्टम' में। मेरे स्कूल में सप्तम और अष्टम कक्षा एक ही कमरे में चलती थी तो मैं हमेशा उसी कमरे में कभी भईया के पास जाकर बैठती, कभी दीदी के पास। आचार्य जी इस बात पर नाराज भी होते थे। करीब छः महीने ऐसे ही चलता रहा।
एक दिन भईया मुझे 'शिशु कक्षा' में ले गए। मैं बहुत डरी हुई थी। पहली शीट पर ही दो छोटी-छोटी लड़कियाँ बैठी थीं। दोनों जुड़वा बहनें लग रही थीं। वो दोनों किताब खोलकर कुछ पढ़ने की कोशिश कर रही थीं। भईया ने दोनों से उनका नाम पूछा। उनमें से एक ने जवाब दिया - "मेरा नाम संध्या, और इनका सौम्या"। फिर भईया मुझे समझाते हुए बोले "देखो संध्या-सौम्या भी पढ़ रही हैं। तुम्हारे कितनी बड़ी ही तो हैं। देखो ये नहीं डर रही हैं। इन्हीं के साथ बैठकर पढ़ो।" अब तक मेरे मन में उन दोनों के प्रति काफी सम्मान की भावना जाग चुकी थी। मुझे अपने ऊपर थोड़ी शर्म आने लगी। वो दोनों थोड़ा किनारे खिसकीं और मैं उनकी ही शीट पर बैठ गई। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गाढ़ी होने लगी। हम हमेशा एक साथ रहते, एक साथ खेलते। टिफिन भी मिल बाँटकर खाते। जिस दिन वो दोनों पढ़ने नहीं आतीं, मेरा दिन बहुत मुश्किल से बीतता था।
बाद में मुझे पता चला कि वो दोनों जुड़वा बहनें नहीं थीं बल्कि संध्या, सौम्या से दो साल की बड़ी थी। इतनी छोटी उमर में ही दोनों के कान छिदे हुए थे। संध्या बता रही थी कि वो अपने मामा के वहाँ गई थी, नागपुर। वहीं उनके कान छिदवा दिए गए थे। वहाँ बचपन में ही लड़कियों के कान छेद दिए जाते हैं क्योंकि बचपन में लड़कियों के कान मुलायम होते हैं, छेड़ने पर जादे दर्द नहीं होता। मुझे भी कान छिदवाने का शौक लगता था लेकिन जब भी मैं मम्मी से इस बारे में बात करती, वो मना कर देती थीं और मेरे लिए चिपकाने वाला कान का टपस ले देती थीं और इस तरह हर बार मेरा ये शौक ठंडा पड़ जाता था।
हम तीनों पांचवीं तक वहीं पढ़े फिर मुझे अपना स्कूल बदलना पड़ गया। एक बालिका इंटर कॉलेज में मेरा दाखिला छठवीं क्लास में हो गया था। मैं उन सबसे दूर जाने पर दुखी थी लेकिन पहले ही दिन जैसे ही मैं कॉलेज के गेट से अंदर घुसी, मुझे सौम्या दिख गई। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा। लगा जैसे भगवान भी नहीं चाहते थे कि हम अलग हो जाएँ।
एक बार फिर हम साथ थे। एक ही कॉलेज में, एक ही क्लास में। मैं दसवीं तक उनके साथ उसी कॉलेज में पढ़ी। फिर मुझे दोबारा अपना स्कूल किसी कारणवश बदलना पड़ा। अब जिस कॉलेज में मेरा नाम था, मैं वहाँ बस नाममात्र पढ़ने गई। पूरे दो साल में बस एक बार। अच्छा ही नहीं लगता था मुझे उनके बिना। और ये कॉलेज उनके घर से काफी दूर था तो सवाल ही नहीं उठता था कि वो यहाँ इतनी दूर पढ़ने आतीं। उनकी पढ़ाई वहीं से चलती रही। लेकिन वो मेरे कोचिंग में ही पढ़ने लगी थीं। जिस कारण हमारा साथ एकदम से कभी नहीं टूटने पाया।
एक बार मैं उनकी दीदी की शादी में उनके घर भी गई थी और मुझे लगा ही नहीं कि मैं अपने घर नहीं थी। संध्या-सौम्या ने बचपन से ही मेरे बारे में अपने घर पर इतना कुछ बता दिया था कि उन लोगों के बर्ताव से मुझे लगा कि मैं सबको पहले से ही जानती थी। हालाँकि मुझे भी सबके बारे में पता था, बस मिली नहीं थी कभी। यही हाल मेरे घर पर भी था। बचपन से ही मैं जब स्कूल से आती तो मुझे कोई चाहिए होता था जिसे मैं दिन-भर उनके साथ कि गई मस्ती के बारे में बता सकूँ। कभी-कभी तो दीदी सुनते-सुनते परेशान हो जाती थी। जब मम्मी और दीदी पास बैठी रहती थीं तो मुझे जादे मेहनत नहीं करनी पड़ती थी लेकिन जब मम्मी काम कर रही होती थीं तब मुझे बारी-बारी से सब कहानी दोनों को सुनानी पड़ती थी।
संध्या-सौम्या भी मेरे घर कई बार आ चुकी हैं। पहले मैं उन्हें अपने घर लाने से डरती थी। मैंने कहीं सुन रखा था कि दोस्ती को बाहर तक ही सीमित रखना चाहिए, जब घर आना-जाना शुरू हुआ तो दोस्ती में दरार पड़ने लगती है। लेकिन अब विश्वास हो गया कि अगर दोस्त अच्छे हों और दोस्ती पक्की हो तो ऐसा कुछ नहीं होता। अब वो दोनों पढ़ने के लिए मुझसे थोड़ी दूर चली गई हैं। ऐसा पहली बार हुआ है जब हम एक साथ नहीं पढ़ रहे लेकिन अब तीनों के पास फोन है तो जब भी हमें एक-दूसरे की याद आती हम कॉल या वीडियो कॉल कर लेते हैं। कभी-कभी मिलना भी हो जाता है। लगता ही नहीं है कि हम दूर हैं। हम जब भी मिलते हैं तो लगता है अभी कल ही तो मिले थे।
हम बचपन से ही इतने करीब रहे हैं कि अगर आप हम तीनों से एक साथ मिलिए तो कह ही नहीं पाएँगे कि हम तीनों सगी बहनें नहीं हैं। हमारे व्यक्तित्व पर जाने-अनजाने एक-दूसरे का गहरा प्रभाव पड़ा है। हमारी पसंद, हमारे शौक भी काफी मिलते हैं। हमारे बीच एक अनुशासन है। हम कभी प्यार-मोहब्बत पर तो बात ही नहीं कर सकते। संध्या, वो तो मुझे अपनी बड़की दीदी लगती है। जरा सा भटको तो डपट देती है। और होना भी चाहिए, दोस्ती में अगर थोड़ा सा अनुशासन भी हो तो फिर अम्बुजा सीमेंट वाली मजबूती आ जाती है दोस्ती में।
संध्या काफी खुशमिजाज है। जब कुछ बोलेगी तो बातें कम, हँसी जादे सुनाई देगी। मैंने उससे हर परिस्थिति में हँसना सीखा है, हर समय पॉजिटिव रहना सीखा है। सौम्या, संध्या से गंभीर है। उम्र में छोटी है वो संध्या से, लेकिन बातों से वो ही बड़ी जान पड़ती है। दोनों आपस में जब भी थोड़ा सा झगड़ा करने की कोशिश करते, उनमें से कोई न कोई हँस ही देता है। काफी मिल-जुलकर रहते हैं दोनों और इसी लिए टीचर्स हमेशा से ही दोनों को जुड़वा समझते आए थे।
हम जब छोटे थे तो आए दिन हमारा झगड़ा भी हो जाता था लेकिन शाम होते-होते हम फिरसे एक हो जाते। फिर अपनी इस बचकानी हरकत पर हँसते। अब हमारा झगड़ा नहीं होता। मैं ही कभी-कभी उनको कॉल नहीं कर पाती मगर वो दोनों कभी गुस्सा नहीं होतीं। वो समझती हैं मुझे।
बचपन में जब हम शिशु मंदिर में थे, हमने सुना था कि अगर बड़ी वाली घास को पकड़कर दोस्त उसपे गाँठ लगा दें तो दोस्ती पक्की और परमानेंट हो जाती है। हमने भी ये बचकानी हरकत की थी। जो भी हो , हो सकता है नुस्खा काम कर गया हो।
हमें जीवन में कई लोग मिलते हैं लेकिन वो हमारे उतने करीब कभी नहीं आ पाते, जितने की हमारे बचपन के दोस्त। और ये बात सिर्फ़ वही समझ पाएँगे जिनके पास बचपन के दोस्त होंगे। लेकिन अगर आपके अंदर का बचपना जीवित है तो अब भी आपके बचपन जैसे पक्के दोस्त बन जाएँगे। बाकी संध्या-सौम्या और अपने लिए शुभकामनाएँ कि हमारी दोस्ती ऐसे ही मजबूत बनी रहे। हम अपने मार्ग से न भटकें, स्वस्थ रहें, मस्त रहें और अपने-अपने लक्ष्य को प्राप्त करें।
सभी दोस्तों को मित्रता दिवस की शुभकामनाएँँ...
जाते-जाते शोले फ़िल्म का वो गीत याद आ रहा है कि-
ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर, तेरा साथ ना छोड़ेंगे...
सुप्रिया दुबे ©
एक दिन भईया मुझे 'शिशु कक्षा' में ले गए। मैं बहुत डरी हुई थी। पहली शीट पर ही दो छोटी-छोटी लड़कियाँ बैठी थीं। दोनों जुड़वा बहनें लग रही थीं। वो दोनों किताब खोलकर कुछ पढ़ने की कोशिश कर रही थीं। भईया ने दोनों से उनका नाम पूछा। उनमें से एक ने जवाब दिया - "मेरा नाम संध्या, और इनका सौम्या"। फिर भईया मुझे समझाते हुए बोले "देखो संध्या-सौम्या भी पढ़ रही हैं। तुम्हारे कितनी बड़ी ही तो हैं। देखो ये नहीं डर रही हैं। इन्हीं के साथ बैठकर पढ़ो।" अब तक मेरे मन में उन दोनों के प्रति काफी सम्मान की भावना जाग चुकी थी। मुझे अपने ऊपर थोड़ी शर्म आने लगी। वो दोनों थोड़ा किनारे खिसकीं और मैं उनकी ही शीट पर बैठ गई। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गाढ़ी होने लगी। हम हमेशा एक साथ रहते, एक साथ खेलते। टिफिन भी मिल बाँटकर खाते। जिस दिन वो दोनों पढ़ने नहीं आतीं, मेरा दिन बहुत मुश्किल से बीतता था।
बाद में मुझे पता चला कि वो दोनों जुड़वा बहनें नहीं थीं बल्कि संध्या, सौम्या से दो साल की बड़ी थी। इतनी छोटी उमर में ही दोनों के कान छिदे हुए थे। संध्या बता रही थी कि वो अपने मामा के वहाँ गई थी, नागपुर। वहीं उनके कान छिदवा दिए गए थे। वहाँ बचपन में ही लड़कियों के कान छेद दिए जाते हैं क्योंकि बचपन में लड़कियों के कान मुलायम होते हैं, छेड़ने पर जादे दर्द नहीं होता। मुझे भी कान छिदवाने का शौक लगता था लेकिन जब भी मैं मम्मी से इस बारे में बात करती, वो मना कर देती थीं और मेरे लिए चिपकाने वाला कान का टपस ले देती थीं और इस तरह हर बार मेरा ये शौक ठंडा पड़ जाता था।
हम तीनों पांचवीं तक वहीं पढ़े फिर मुझे अपना स्कूल बदलना पड़ गया। एक बालिका इंटर कॉलेज में मेरा दाखिला छठवीं क्लास में हो गया था। मैं उन सबसे दूर जाने पर दुखी थी लेकिन पहले ही दिन जैसे ही मैं कॉलेज के गेट से अंदर घुसी, मुझे सौम्या दिख गई। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा। लगा जैसे भगवान भी नहीं चाहते थे कि हम अलग हो जाएँ।
एक बार फिर हम साथ थे। एक ही कॉलेज में, एक ही क्लास में। मैं दसवीं तक उनके साथ उसी कॉलेज में पढ़ी। फिर मुझे दोबारा अपना स्कूल किसी कारणवश बदलना पड़ा। अब जिस कॉलेज में मेरा नाम था, मैं वहाँ बस नाममात्र पढ़ने गई। पूरे दो साल में बस एक बार। अच्छा ही नहीं लगता था मुझे उनके बिना। और ये कॉलेज उनके घर से काफी दूर था तो सवाल ही नहीं उठता था कि वो यहाँ इतनी दूर पढ़ने आतीं। उनकी पढ़ाई वहीं से चलती रही। लेकिन वो मेरे कोचिंग में ही पढ़ने लगी थीं। जिस कारण हमारा साथ एकदम से कभी नहीं टूटने पाया।
एक बार मैं उनकी दीदी की शादी में उनके घर भी गई थी और मुझे लगा ही नहीं कि मैं अपने घर नहीं थी। संध्या-सौम्या ने बचपन से ही मेरे बारे में अपने घर पर इतना कुछ बता दिया था कि उन लोगों के बर्ताव से मुझे लगा कि मैं सबको पहले से ही जानती थी। हालाँकि मुझे भी सबके बारे में पता था, बस मिली नहीं थी कभी। यही हाल मेरे घर पर भी था। बचपन से ही मैं जब स्कूल से आती तो मुझे कोई चाहिए होता था जिसे मैं दिन-भर उनके साथ कि गई मस्ती के बारे में बता सकूँ। कभी-कभी तो दीदी सुनते-सुनते परेशान हो जाती थी। जब मम्मी और दीदी पास बैठी रहती थीं तो मुझे जादे मेहनत नहीं करनी पड़ती थी लेकिन जब मम्मी काम कर रही होती थीं तब मुझे बारी-बारी से सब कहानी दोनों को सुनानी पड़ती थी।
संध्या-सौम्या भी मेरे घर कई बार आ चुकी हैं। पहले मैं उन्हें अपने घर लाने से डरती थी। मैंने कहीं सुन रखा था कि दोस्ती को बाहर तक ही सीमित रखना चाहिए, जब घर आना-जाना शुरू हुआ तो दोस्ती में दरार पड़ने लगती है। लेकिन अब विश्वास हो गया कि अगर दोस्त अच्छे हों और दोस्ती पक्की हो तो ऐसा कुछ नहीं होता। अब वो दोनों पढ़ने के लिए मुझसे थोड़ी दूर चली गई हैं। ऐसा पहली बार हुआ है जब हम एक साथ नहीं पढ़ रहे लेकिन अब तीनों के पास फोन है तो जब भी हमें एक-दूसरे की याद आती हम कॉल या वीडियो कॉल कर लेते हैं। कभी-कभी मिलना भी हो जाता है। लगता ही नहीं है कि हम दूर हैं। हम जब भी मिलते हैं तो लगता है अभी कल ही तो मिले थे।
हम बचपन से ही इतने करीब रहे हैं कि अगर आप हम तीनों से एक साथ मिलिए तो कह ही नहीं पाएँगे कि हम तीनों सगी बहनें नहीं हैं। हमारे व्यक्तित्व पर जाने-अनजाने एक-दूसरे का गहरा प्रभाव पड़ा है। हमारी पसंद, हमारे शौक भी काफी मिलते हैं। हमारे बीच एक अनुशासन है। हम कभी प्यार-मोहब्बत पर तो बात ही नहीं कर सकते। संध्या, वो तो मुझे अपनी बड़की दीदी लगती है। जरा सा भटको तो डपट देती है। और होना भी चाहिए, दोस्ती में अगर थोड़ा सा अनुशासन भी हो तो फिर अम्बुजा सीमेंट वाली मजबूती आ जाती है दोस्ती में।
संध्या काफी खुशमिजाज है। जब कुछ बोलेगी तो बातें कम, हँसी जादे सुनाई देगी। मैंने उससे हर परिस्थिति में हँसना सीखा है, हर समय पॉजिटिव रहना सीखा है। सौम्या, संध्या से गंभीर है। उम्र में छोटी है वो संध्या से, लेकिन बातों से वो ही बड़ी जान पड़ती है। दोनों आपस में जब भी थोड़ा सा झगड़ा करने की कोशिश करते, उनमें से कोई न कोई हँस ही देता है। काफी मिल-जुलकर रहते हैं दोनों और इसी लिए टीचर्स हमेशा से ही दोनों को जुड़वा समझते आए थे।
हम जब छोटे थे तो आए दिन हमारा झगड़ा भी हो जाता था लेकिन शाम होते-होते हम फिरसे एक हो जाते। फिर अपनी इस बचकानी हरकत पर हँसते। अब हमारा झगड़ा नहीं होता। मैं ही कभी-कभी उनको कॉल नहीं कर पाती मगर वो दोनों कभी गुस्सा नहीं होतीं। वो समझती हैं मुझे।
बचपन में जब हम शिशु मंदिर में थे, हमने सुना था कि अगर बड़ी वाली घास को पकड़कर दोस्त उसपे गाँठ लगा दें तो दोस्ती पक्की और परमानेंट हो जाती है। हमने भी ये बचकानी हरकत की थी। जो भी हो , हो सकता है नुस्खा काम कर गया हो।
हमें जीवन में कई लोग मिलते हैं लेकिन वो हमारे उतने करीब कभी नहीं आ पाते, जितने की हमारे बचपन के दोस्त। और ये बात सिर्फ़ वही समझ पाएँगे जिनके पास बचपन के दोस्त होंगे। लेकिन अगर आपके अंदर का बचपना जीवित है तो अब भी आपके बचपन जैसे पक्के दोस्त बन जाएँगे। बाकी संध्या-सौम्या और अपने लिए शुभकामनाएँ कि हमारी दोस्ती ऐसे ही मजबूत बनी रहे। हम अपने मार्ग से न भटकें, स्वस्थ रहें, मस्त रहें और अपने-अपने लक्ष्य को प्राप्त करें।
सभी दोस्तों को मित्रता दिवस की शुभकामनाएँँ...
जाते-जाते शोले फ़िल्म का वो गीत याद आ रहा है कि-
ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर, तेरा साथ ना छोड़ेंगे...
सुप्रिया दुबे ©
