रामगढ़ ताल, गोरखपुर

रामगढ़ ताल, गोरखपुर...
गोरखपुर शहर के किनारे लगभग 700 एकड़ में फैला ये ताल अपने आप में कई कहानियाँ समेटे हुए है। हालाँकि लगातार आवासीय निर्माण और अतिक्रमण के चलते इसका क्षेत्रफल पहले की अपेक्षा काफी सिमट गया है लेकिन पिछले कुछ सालों से इसकी साफ-सफाई पर ख़ास ध्यान दिया जा रहा है। ऐसे समय में जब ताल-पोखरे के अस्तित्व को जीवित रखना अपने-आप में चुनौती हो गई है, सरकार को इसे एक पर्यटक-स्थल के रूप में बढ़ावा देने की जरूरत है। यहाँ जैव-विविधता देखी जा सकती है। इस ताल में कई प्रजाति की मछलियाँ और पक्षी पाए जाते हैं। साथ ही यह कई पशुओं का जलस्त्रोत भी है। यह ताल गोरखपुर शहर को देता है एक ख़ास पहचान...
                दिन-भर की भागदौड़ के बाद शहर के शोर-शराबे से दूर शाम को यहाँ दूर-दराज के इलाकों से घूमने आए लोगों का हुजूम देखा जा सकता है...कहीं कोई बोटिंग का लुत्फ़ उठा रहा है, कहीं लोग फ़ोटो खिंचवाने में लगे हैं तो कहीं बच्चे झालमुड़ी और आइसक्रीम खरीदने की ज़िद कर रहे हैं... ताल से आती ठंडी हवा मानो लोगों की थकान और उलझनों को भी अपने साथ उड़ाए ले जा रही है...हर किसी के चेहरे पे मुस्कान देखी जा सकती है...यहाँ रात में म्यूजिकल वाटर शो देखने को लेकर लोगों में काफी उत्सुकता होती है।
पर्यटक स्थलों पर साफ-सफाई का ध्यान रखते हुए हम जैव विविधता को संरक्षित करने में अपना व्यक्तिगत योगदान दे सकते हैं...
जैव विविधता दिवस की शुभकामनाएँ...

~ सुप्रिया दुबे © (22/05/2019)

यह शहर है

यह शहर है
यहाँ इतनी बेहिसाब रोशनी है
कि पूर्णिमा का चाँद भी नहीं दिखता
साफ-साफ
जिसमें लोग तलाशते थे
चरखा कातती बुढ़िया माई की आकृति
न ही दिखते हैं टिमटिमाते तारे
जिन्हें गिनते हुए प्रेयसियाँ
काट लेती थीं विरह की लम्बी रातें
यहाँ दिन और रात में इतना कम अंतर है
कि लोग तरसते हैं
दो पल के अंधेरे के लिए
दिन-रात के कृत्रिम चकाचौंध के चलते
शहर पढ़ने आए छोटू की आँखों पर
चढ़ गया है चश्मा
उसे याद आता है अपना गाँव
और वो ढिबरियाँ
जिन्हें माँ ने सिरप की शीशियों से बनाया था।
~ सुप्रिया दुबे

मैं तुम्हें जाने न दूँगी!

मैं तुम्हें जाने न दूँगी!
प्रेम से भर दूँगी जीवन
अपना सब कुछ वार दूँगी
मधुरतम मुस्कान बनकर
तेरे अधरों से हँसूँगी
मैं तुम्हें जाने न दूँगी...

तेरी कीमत पर मिले तो
स्वर्ग ना मुझको गँवारा
कौन दुनिया? कैसी दुनिया?
तेरी ख़ातिर छोड़ दूँगी
मैं तुम्हें जाने न दूँगी....

क्या उखाड़ेगी ये दुनिया?
क्या बिगाड़ेंगे विधाता?
अपने हाथों से तुम्हें
मैं अपनी किस्मत में लिखूँगी
मैं तुम्हें जाने न दूँगी...

हे कलाधर! हे कलानिधि!
क्यों हो डूबे तम में ऐसे?
शुभ्र ज्योतित ज्योत्सना का
मैं निरा उपहार दूँगी
मैं तुम्हें जाने न दूँगी...

प्रेम बन मैं हर जनम
तेरी कलम को धार दूँगी
भूल जाएगा तू हर दुःख
मैं अपरिमित प्यार दूँगी
मैं तुम्हें जाने न दूँगी...

~ सुप्रिया दुबे ©