मैं तुम्हें जाने न दूँगी!

मैं तुम्हें जाने न दूँगी!
प्रेम से भर दूँगी जीवन
अपना सब कुछ वार दूँगी
मधुरतम मुस्कान बनकर
तेरे अधरों से हँसूँगी
मैं तुम्हें जाने न दूँगी...

तेरी कीमत पर मिले तो
स्वर्ग ना मुझको गँवारा
कौन दुनिया? कैसी दुनिया?
तेरी ख़ातिर छोड़ दूँगी
मैं तुम्हें जाने न दूँगी....

क्या उखाड़ेगी ये दुनिया?
क्या बिगाड़ेंगे विधाता?
अपने हाथों से तुम्हें
मैं अपनी किस्मत में लिखूँगी
मैं तुम्हें जाने न दूँगी...

हे कलाधर! हे कलानिधि!
क्यों हो डूबे तम में ऐसे?
शुभ्र ज्योतित ज्योत्सना का
मैं निरा उपहार दूँगी
मैं तुम्हें जाने न दूँगी...

प्रेम बन मैं हर जनम
तेरी कलम को धार दूँगी
भूल जाएगा तू हर दुःख
मैं अपरिमित प्यार दूँगी
मैं तुम्हें जाने न दूँगी...

~ सुप्रिया दुबे ©