यह शहर है

यह शहर है
यहाँ इतनी बेहिसाब रोशनी है
कि पूर्णिमा का चाँद भी नहीं दिखता
साफ-साफ
जिसमें लोग तलाशते थे
चरखा कातती बुढ़िया माई की आकृति
न ही दिखते हैं टिमटिमाते तारे
जिन्हें गिनते हुए प्रेयसियाँ
काट लेती थीं विरह की लम्बी रातें
यहाँ दिन और रात में इतना कम अंतर है
कि लोग तरसते हैं
दो पल के अंधेरे के लिए
दिन-रात के कृत्रिम चकाचौंध के चलते
शहर पढ़ने आए छोटू की आँखों पर
चढ़ गया है चश्मा
उसे याद आता है अपना गाँव
और वो ढिबरियाँ
जिन्हें माँ ने सिरप की शीशियों से बनाया था।
~ सुप्रिया दुबे