शुरू से ही दोस्त बनाने की मेरी आदत नहीं रही है। हाँ, लेकिन जो मेरा दोस्त बनना चाहते हैं, उन्हें मैं सहर्ष स्वीकार करती हूँ। ऐसे में सम्भव है कि मैं कभी अकेलापन महसूस करने लगूँ लेकिन किताबें मुझे ऐसा महसूस होने नहीं देतीं। और कहीं न कहीं इनके रूप में मेरे पास इतने मित्र हैं कि मुझे कभी मित्रों की कमी महसूस नहीं होती। ये मुझे हँसाती हैं, रुलाती हैं, मुझसे बातें करती हैं। मैं इन्हें सुन सकती हूँ, ये मेरी भावनाओं को सुन सकती हैं। जब कभी भी मैं किसी असमंजस की स्थिति में होती हूँ, ये मेरा मार्गदर्शन करती हैं। मुझे अपनी कमियों को सुधारने का रास्ता बतलाती हैं। वर्तमान व भूतकाल के दुर्लभ विद्वानों से मिलवाती हैं। उनके अंतर्मन में झाँकने का मौका देती हैं। मुझे मेरी औकात बताती हैं। ऐसे में मुझे इनसे बेहतर कोई मित्र दिखाई नहीं पड़ता।
'किताबों का शौक' वो शौक है जो हमें सबसे अमीर बनाता है। हम कम खाएँ, कमतर पहनें लेकिन किताबों के मामले में कंजूसी ना करें। रही बात कि मुझे किताबों का शौक कबसे लगा? तो बता दूँ कि मैंने जबसे पढ़ना सीखा। हाँ, मैं घर में सबसे छोटी थी, मुझसे बड़े दीदी और भईया थे। उन्हें कॉमिक्स और बाल पत्रिकाएँ पढ़ने का शौक था। कभी मैंने भी यूँ ही उनपर हाथ मारा और मुझे मजा आने लगा। थोड़ा बहुत पढ़ने लगी। फिर वे बड़े हुए उनका वो शौक छूटा, मैं भी स्कूल आदि के कामों में व्यस्त रहने लग गयी। फिर 8 वीं या 9 वीं में एकदिन मेरे हाथ आयी "ग़बन"। मैंने यूँ ही एक पन्ना पढ़ा, आगे की कहानी जानने की उत्सुकता बढ़ी और मैं पढ़ती चली गई। यह पहला उपन्यास था जो मैंने पढ़ा और पूरा पढ़ा। इसके बाद घर में मौजूद किताबों को खोज-खोज के पढ़ने लगी। और इस तरह मुझे पढ़ने का चस्का लग गया। फिर दो साल पहले मैं फेसबुक के जरिये आप सब से जुड़ी, और मेरे इस शौक में घी का काम किया आपकी संगति ने।
आज कोई मेरे जन्मदिन पर मुझे कुछ भेंट करने के लिए कहता है, तो मैं यथासम्भव कोई किताब ही देने के लिए कहती हूँ। क्योंकि मैं जानती हूँ कि किताब से बेहतर पैसा वसूल और कुछ भी नहीं हो सकता।
आज "विश्व पुस्तक दिवस" है तो किताबों को झाड़ना-पोंछना बनता था। सोचा अपने छोटे से संग्रह की तस्वीर भी साझा की जाए।
शुभकामनाओं सहित!
(23/4/2020)