इक मैं हूँ तेरी याद में खुद को ही भूले जा रही
इक तू है कहता है कि कोई याद नहीं करता है !
~ सुप्रिया दूबे ©
इक मैं हूँ तेरी याद में खुद को ही भूले जा रही
इक तू है कहता है कि कोई याद नहीं करता है !
~ सुप्रिया दूबे ©
सुंदर, प्यारी भाषाओं बिच
मैंने अपनाया है ‛तुझको’
गर ‛तू’ भी मुझको अपना ले
तब जाकर कोई बात बने !
~ सुप्रिया दूबे ©
शहर का आखिरी छोर, एक-दूसरे से प्रतिद्वंद्विता करती निर्माणाधीन इमारतें, जगह-जगह बालू, मोरंग,गिट्टी के ढेर और काम करते मजदूर। आज यह जगह किसी कालोनी का रूप ले रही थी। महीने भर पहले यहाँ एक घनी बाग हुआ करती थी जिसमें कई तरह के पेड़ थे- आम, नीम, महुआ, शीशम, गुलमोहर और भी न जाने कितने! मगर आज दूर-दूर तक सब कुछ निर्जीव, बेजान सा दिख रहा था। शाम हो आई थी। सूरज डूबने ही वाला था, तभी एक चिड़िया सबसे ऊँची इमारत की छत की एक छोर पर आकर बैठ जाती है। कुछ देर वहाँ बैठकर वह देखती है- काम कर रहे उन मजदूरों को, निर्माणाधीन इमारतों को और निर्जीव हो चुकी उस धरती को...फिर उड़ जाती है दूर आसमान में...और देखते ही देखते आँखों से ओझल हो जाती है...........
-- सुप्रिया दूबे ©
न सोचो कभी भी कि जाने क्या होगा,
अगरचे कुछ नहीं होगा तो तजुर्बा होगा !
~ सुप्रिया दूबे ©
तिरे ही मुस्कुराने से फ़िज़ा में फूल खिलते हैं,
तू यूँ ही मुस्कुरा हरदम ही प्यासी तितलियों के लिए !
~ सुप्रिया दूबे ©