आँखों में रख इक आग तू
मैदान छोड़ मत भाग तू
उत्साह को साथी बना
लड़ बन के अर्जुन पार्थ तू
मैदान छोड़ मत भाग तू
उत्साह को साथी बना
लड़ बन के अर्जुन पार्थ तू
डर को डरा, धर धीर तू
सागर है इक गंभीर तू
तू खुद में ही गोते लगा
निकलेंगे मोती बारहा
सागर है इक गंभीर तू
तू खुद में ही गोते लगा
निकलेंगे मोती बारहा
है आग तू, खुद को समझ
तू आसमां पर जा चमक
सूरज भी ये जल जाएगा
तुझमें तो है ऐसी धधक
तू आसमां पर जा चमक
सूरज भी ये जल जाएगा
तुझमें तो है ऐसी धधक
खुद को न तू कमतर समझ
पहचान अपनी खामियाँ
खुद को जरा तराश के
हो उठ खड़ा मैदान में
पहचान अपनी खामियाँ
खुद को जरा तराश के
हो उठ खड़ा मैदान में
तू सिंह है, कर गर्जना
डोलेंगे धरती-आसमां
इस मोह के संसार में
खुद को जरा पत्थर बना
डोलेंगे धरती-आसमां
इस मोह के संसार में
खुद को जरा पत्थर बना
रख लक्ष्य को ही ध्यान में
कर काल का सन्धान तू
तेरी रगों में खून है
आजाद का, चौहान का
भूगर्भ का उद्गार है
ब्रह्मांड का आधार तू
तू उस कवि की कल्पना
जो रहित है श्रृंगार से !
कर काल का सन्धान तू
तेरी रगों में खून है
आजाद का, चौहान का
भूगर्भ का उद्गार है
ब्रह्मांड का आधार तू
तू उस कवि की कल्पना
जो रहित है श्रृंगार से !
- सुप्रिया दुबे ©
