चाँदनी रात है...आसमान में तारे भी आज साफ दिखाई दे रहे हैं। आज बहुत दिनों बाद पूरा परिवार छत पर एक साथ इकट्ठा हुआ है। बड़ा अच्छा लग रहा है सबको यूँ एक साथ देखकर। सब आपस में बातें कर रहे हैं। इधर मैं चटाई पर लेटे हुए धीरे-धीरे ग़ज़लें सुन रही हूँ।
“रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह...” ये ग़ज़ल बस अभी-अभी ख़त्म हुई है।
“बेचैन बहुत फिरना, घबराए हुए रहना...” अब यह ग़ज़ल बज रही है।
पहली बार में मुझे यह ग़ज़ल बहुत से थोड़ी कम पसन्द आई थी मगर आज जब दोबारा सुन रही हूँ तो बहुत से थोड़ी ज़्यादा पसन्द आ रही है। दरअसल, ग़ज़लों की एक ख़ासियत होती है कि आपको पहली बार में कोई ग़ज़ल उतनी पसन्द नहीं आती मगर जब आप उसे दोबारा सुनते हैं तो वही ग़ज़ल आपको अच्छी लगने लगती है।
जैसे-जैसे ग़ज़लें बदल रही हैं, मेरा मूड भी बदल रहा है। मैंने देखा है, ग़ज़लें सुनने का मन अक्सर शाम को करता है या फिर रात में, जब हमारा दिल फुर्सत में होता है। फुर्सत में ही हमें ‘उनकी’ याद भी आती है। वो ग़ज़ल भी तो है...
“दिन भर तो मैं दुनिया के धंधों में खोया रहा..जब दीवारों से धूप ढली, तुम याद आए...”
आज सुबह से ही लाइट कटी है। अभी भी लाइट नहीं है। मैं मन ही मन मना रही हूँ -
“भगवान करें हर दूसरे दिन ऐसे ही लाइट न रहे! कम से कम सब इकट्ठे तो होंगे इसी बहाने! कम से कम चारों ओर चकाचौंध तो नहीं होगी! चाँद और तारे तो साफ दिखाई देंगे!”
आप यकीन नहीं मानेंगे लेकिन आज जब लाइट नहीं है तब हवा भी जादे ठंडी लग रही है। लग रहा है जैसे रोज शहर की सारी लाइटें ही मिलकर हवा को गर्म बना देती थीं। सामने वाले के दरवाजे पर आज दो मोमबत्तियाँ अपने अस्तित्व पर इतराते हुए झूम-झूमकर जल रही हैं।
आज बहुत दिन बाद गाँव वाली फीलिंग आई है। मेरा गाँव नदी के किनारे है। रात में छत पर खूब ठंडी हवा चलती थी। चाँदनी रात में हम ऐसे ही छत पर खुले आसमान के नीचे सोते थे। सब आपस में खूब बातें करते थे। और इसी तरह सोए हुए मैं ‘साँवरिया’ फ़िल्म के गाने सुनती थी।
“गुमसुम चाँदनी हो, नाज़िनी हो, या कोई हूर हो?...”
“एक दिन आसमां से परी आएगी...”
और सुनते-सुनते परियों की कल्पनाएँ करने लगती थी। आसमान में बिखरे सफेद बादलों में आकृतियाँ खोजने लगती थी।
मुझे बचपन से ही गाने सुनना बहुत पसंद है। हम जब गाँव में थे तो वहाँ लाइट बहुत कम रहती थी। टीवी उतनी चलती नहीं थी, हम सुबह से लेकर रात तक ‘विविध-भारती’ सुनते रहते थे।
‘सखी-सहेली’, ‘हेलो फरमाइश’, ‘चित्रलोक’ और भी न जाने कितने ही प्रोग्राम आते थे।
इधर रेडियो बजता रहता था उधर हम अपना काम करते रहते थे। जब कभी रेडियो पर “दिल ढूँढता है...” गाना बजता तो मैं सोचने लगती कि एक समय आएगा जब हम गाँव से दूर होंगे, हमारे पास फुर्सत नहीं होगी, तब हमें यह समय याद आएगा...और आज मुझे वो फुर्सत के दिन याद आ रहे हैं, छत पे गुज़ारी वो रातें याद आ रही हैं, मुझे मेरा गाँव याद आ रहा है।
मैंने फोन में वही गाना लगा दिया है... और आसमान की ओर देखते हुए मैं उन्हीं पुरानी यादों में खोए जा रही हूँ...
इधर धीरे-धीरे बज रहा है,
“दिल ढूँढता है, फिर वही, फुर्सत के रात-दिन...”
सुप्रिया दुबे ©
“रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह...” ये ग़ज़ल बस अभी-अभी ख़त्म हुई है।
“बेचैन बहुत फिरना, घबराए हुए रहना...” अब यह ग़ज़ल बज रही है।
पहली बार में मुझे यह ग़ज़ल बहुत से थोड़ी कम पसन्द आई थी मगर आज जब दोबारा सुन रही हूँ तो बहुत से थोड़ी ज़्यादा पसन्द आ रही है। दरअसल, ग़ज़लों की एक ख़ासियत होती है कि आपको पहली बार में कोई ग़ज़ल उतनी पसन्द नहीं आती मगर जब आप उसे दोबारा सुनते हैं तो वही ग़ज़ल आपको अच्छी लगने लगती है।
जैसे-जैसे ग़ज़लें बदल रही हैं, मेरा मूड भी बदल रहा है। मैंने देखा है, ग़ज़लें सुनने का मन अक्सर शाम को करता है या फिर रात में, जब हमारा दिल फुर्सत में होता है। फुर्सत में ही हमें ‘उनकी’ याद भी आती है। वो ग़ज़ल भी तो है...
“दिन भर तो मैं दुनिया के धंधों में खोया रहा..जब दीवारों से धूप ढली, तुम याद आए...”
आज सुबह से ही लाइट कटी है। अभी भी लाइट नहीं है। मैं मन ही मन मना रही हूँ -
“भगवान करें हर दूसरे दिन ऐसे ही लाइट न रहे! कम से कम सब इकट्ठे तो होंगे इसी बहाने! कम से कम चारों ओर चकाचौंध तो नहीं होगी! चाँद और तारे तो साफ दिखाई देंगे!”
आप यकीन नहीं मानेंगे लेकिन आज जब लाइट नहीं है तब हवा भी जादे ठंडी लग रही है। लग रहा है जैसे रोज शहर की सारी लाइटें ही मिलकर हवा को गर्म बना देती थीं। सामने वाले के दरवाजे पर आज दो मोमबत्तियाँ अपने अस्तित्व पर इतराते हुए झूम-झूमकर जल रही हैं।
आज बहुत दिन बाद गाँव वाली फीलिंग आई है। मेरा गाँव नदी के किनारे है। रात में छत पर खूब ठंडी हवा चलती थी। चाँदनी रात में हम ऐसे ही छत पर खुले आसमान के नीचे सोते थे। सब आपस में खूब बातें करते थे। और इसी तरह सोए हुए मैं ‘साँवरिया’ फ़िल्म के गाने सुनती थी।
“गुमसुम चाँदनी हो, नाज़िनी हो, या कोई हूर हो?...”
“एक दिन आसमां से परी आएगी...”
और सुनते-सुनते परियों की कल्पनाएँ करने लगती थी। आसमान में बिखरे सफेद बादलों में आकृतियाँ खोजने लगती थी।
मुझे बचपन से ही गाने सुनना बहुत पसंद है। हम जब गाँव में थे तो वहाँ लाइट बहुत कम रहती थी। टीवी उतनी चलती नहीं थी, हम सुबह से लेकर रात तक ‘विविध-भारती’ सुनते रहते थे।
‘सखी-सहेली’, ‘हेलो फरमाइश’, ‘चित्रलोक’ और भी न जाने कितने ही प्रोग्राम आते थे।
इधर रेडियो बजता रहता था उधर हम अपना काम करते रहते थे। जब कभी रेडियो पर “दिल ढूँढता है...” गाना बजता तो मैं सोचने लगती कि एक समय आएगा जब हम गाँव से दूर होंगे, हमारे पास फुर्सत नहीं होगी, तब हमें यह समय याद आएगा...और आज मुझे वो फुर्सत के दिन याद आ रहे हैं, छत पे गुज़ारी वो रातें याद आ रही हैं, मुझे मेरा गाँव याद आ रहा है।
मैंने फोन में वही गाना लगा दिया है... और आसमान की ओर देखते हुए मैं उन्हीं पुरानी यादों में खोए जा रही हूँ...
इधर धीरे-धीरे बज रहा है,
“दिल ढूँढता है, फिर वही, फुर्सत के रात-दिन...”
सुप्रिया दुबे ©
