कहा जाता है कि दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत घटनाएँ धोखे से ही घटती हैं। ऐसा ही कुछ कल मेरे साथ हुआ। एक महीने पहले “अक्टूबर जंक्शन” मँगाए थे पढ़ने के लिए लेकिन अत्यधिक व्यस्तता और गर्मी के कारण पढ़ नहीं पा रहे थे। कल ऐसे ही किताब उठा के पन्ने उलटने-पलटने लगे। हालाँकि गर्मी अधिक थी, मन नहीं था पढ़ने का लेकिन जैसे ही एक पन्ना पढ़े बस पढ़ते ही चले गए। अगले चौबीस घंटे के अंदर पूरी किताब पढ़कर ख़त्म।
असल में अक्टूबर जंक्शन कि कहानी ही कुछ ऐसी है कि "आगे क्या होगा" यह जानने कि जिज्ञासा पूरी किताब पढ़ते वक़्त बनी रहती है और इसी चक्कर में आप किताब पढ़ते चले जाते हैं।
वैसे तो दिव्य भईया की कोई किताब पहली बार पढ़े लेकिन काफी अपनापन सा लगा। किताब में लिखी लगभग सब बातों से सहमति बन रही थी। लगभग हर चौथे पन्ने पर कुछ ऐसा मिल ही जाता जिसे अंडरलाइन करने की जरूरत महसूस होती। कुछ बातें ऐसी रहीं जो कभी नहीं भूलेंगी। जिनमें जीवन की “फिलॉसफी” छिपी थी। बहुत सी बातें सीखने लायक थीं। ऐसी ही किताबों के लिखे जाने की जरूरत है जो मनोरंजन करने के साथ कुछ सीख भी दे जाएँ।
आज के समय में जहाँ लोगों को प्यार के मायने तक नहीं पता, वहीं यह किताब हमें प्यार का असल मतलब समझाती है और बताती है कि कैसे दूर रहकर भी हम एक-दूसरे से सच्चा प्यार कर सकते हैं, जरूरत के समय उसकी मदद कर सकते हैं।
कहानी बनारस से शुरू होती है जहाँ चित्रा और सुदीप धोखे से एक-दूसरे से मिलते हैं और दुनिया की एक खूबसूरत प्रेम कहानी बनती चली जाती है। चित्रा और सुदीप की यह कहानी हर किसी के पढ़ने लायक है ख़ासकर कि लव स्टोरी में रुचि रखने वाले लोगों के लिए। कहीं कोई अश्लीलता नहीं है।
कुल मिलाकर मजा आया पढ़ने में। इसको पढ़ने के बाद अब दिव्य भईया की बाकी बची किताबें पढ़ने का भी मन हो रहा। पढ़ते हैं सब बारी-बारी से। आपलोग भी पढ़िए “अक्टूबर जंक्शन”, अच्छी किताब है और जो लोग पढ़ लिए हैं वो लोग दुबारा पढ़ लीजिए और हाँ, साथ में एक पेंसिल या हाईलाइटर भी रखिएगा क्योंकि कई जगह अंडरलाइन करने की जरूरत पड़ेगी।
दिव्य भईया से विनम्र अनुरोध कि ऐसे ही अच्छी-अच्छी किताबें लिखते रहें, हम पढ़ते रहेंगे। आगामी पुस्तकों के लिए शुभकामनाएँ और इंतजार।
सुप्रिया दुबे ©
(सन्त कबीर नगर)
असल में अक्टूबर जंक्शन कि कहानी ही कुछ ऐसी है कि "आगे क्या होगा" यह जानने कि जिज्ञासा पूरी किताब पढ़ते वक़्त बनी रहती है और इसी चक्कर में आप किताब पढ़ते चले जाते हैं।
वैसे तो दिव्य भईया की कोई किताब पहली बार पढ़े लेकिन काफी अपनापन सा लगा। किताब में लिखी लगभग सब बातों से सहमति बन रही थी। लगभग हर चौथे पन्ने पर कुछ ऐसा मिल ही जाता जिसे अंडरलाइन करने की जरूरत महसूस होती। कुछ बातें ऐसी रहीं जो कभी नहीं भूलेंगी। जिनमें जीवन की “फिलॉसफी” छिपी थी। बहुत सी बातें सीखने लायक थीं। ऐसी ही किताबों के लिखे जाने की जरूरत है जो मनोरंजन करने के साथ कुछ सीख भी दे जाएँ।
आज के समय में जहाँ लोगों को प्यार के मायने तक नहीं पता, वहीं यह किताब हमें प्यार का असल मतलब समझाती है और बताती है कि कैसे दूर रहकर भी हम एक-दूसरे से सच्चा प्यार कर सकते हैं, जरूरत के समय उसकी मदद कर सकते हैं।
कहानी बनारस से शुरू होती है जहाँ चित्रा और सुदीप धोखे से एक-दूसरे से मिलते हैं और दुनिया की एक खूबसूरत प्रेम कहानी बनती चली जाती है। चित्रा और सुदीप की यह कहानी हर किसी के पढ़ने लायक है ख़ासकर कि लव स्टोरी में रुचि रखने वाले लोगों के लिए। कहीं कोई अश्लीलता नहीं है।
कुल मिलाकर मजा आया पढ़ने में। इसको पढ़ने के बाद अब दिव्य भईया की बाकी बची किताबें पढ़ने का भी मन हो रहा। पढ़ते हैं सब बारी-बारी से। आपलोग भी पढ़िए “अक्टूबर जंक्शन”, अच्छी किताब है और जो लोग पढ़ लिए हैं वो लोग दुबारा पढ़ लीजिए और हाँ, साथ में एक पेंसिल या हाईलाइटर भी रखिएगा क्योंकि कई जगह अंडरलाइन करने की जरूरत पड़ेगी।
दिव्य भईया से विनम्र अनुरोध कि ऐसे ही अच्छी-अच्छी किताबें लिखते रहें, हम पढ़ते रहेंगे। आगामी पुस्तकों के लिए शुभकामनाएँ और इंतजार।
सुप्रिया दुबे ©
(सन्त कबीर नगर)
