कल मैंने पहली बार अमेजन से कोई किताब खुद ऑर्डर कर के मँगाई। डिलिवरी वाला भीगते हुए किताब पहुँचाने आया था। पिछले दो-तीन दिन से लगातार बारिश हो रही है लेकिन जब मैंने ऑर्डर किया था तो मौसम बिल्कुल साफ था। मैंने नहीं सोचा था कि मेरी वजह से किसी को भीगना पड़ेगा। वैसे किताब अच्छी है- प्रेम कबूतर। मानव कौल लिखते हैं कि प्रेम आदमी को कबूतर बना देता है। अगर वाकई ऐसा है तो मैं भी कबूतर बनना चाहूँगी। कम से कम उड़ तो सकूँगी।
मुझे किताबें पढ़ना बहुत अच्छा लगता है और जब वह किताब मैंने खुद मँगाई हो तो और भी ज्यादा। इस किताब में लिखी साधारण बातों पर भी हँसी आती है या शायद मैं इसलिए ज्यादा हँसती हूँ ताकि घरवालों को ये न लगे कि इसने किताब के पैसे डुबा दिए। किताबें हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं, ख़ासतौर से मेरे जैसे अंतर्मुखी लोगों की, जिनके साथ हम हँस सकते हैं, समय बिता सकते हैं।
आज बरामदे में बैठी यही "प्रेम कबूतर" पढ़ रही थी। बाहर तेज बरसात हो रही थी। सामने के एक खेत में लबालब पानी भरा है तो कुछ बन्दर पास के ही अमरूद के पेड़ों पर चढ़कर पानी में छलाँग लगा रहे थे और बार-बार यही क्रिया दुहराई जा रही थी। तभी बन्दर के एक छोटे बच्चे ने शायद अपनी माँ से पानी में छलाँग लगाने की इच्छा जाहिर की लेकिन उसकी माँ ने उसके छोटे कद के चलते उसे ऐसा करने से मना कर दिया। शायद इस बात से बच्चे के बालमन पे ठेस पहुँची थी और उसने पेड़ से छलाँग लगा दी लेकिन अपने छोटे कद के चलते वो पानी तक नहीं पहुँच सका बल्कि नीचे ही मेंढक की तरह पसर गया। चोट तो लगी ही होगी उसे लेकिन झट से वापस अपनी माँ के पास पहुँच गया। तब उसे पहली बार एहसास हुआ था कि हमारे बड़े हमेशा उचित सलाह देते हैं। क्या करे उसकी भी क्या गलती थी! जीवन की पहली बारिश देखी थी उसने और बच्चों में तो बड़ा होने की काफी जल्दी होती ही है।
किताब पढ़ते हुए मेरा ध्यान बार-बार बारिश में भीग रहे उन बंदरों की ओर जा रहा था। कुछ एक दूसरे को दौड़ा रहे थे। कुछ वही मटमैला पानी पी रहे थे। कुछ छोटे बन्दर पानी में तैर रहे थे। कुछ बस पेड़ पे चढ़ते और छलाँग लगाते। कितने स्वछंद थे वो! अपने में ही मस्त! उन्हें देखकर मुझे पहली बार एहसास हुआ था कि पढ़ाई से ध्यान भटकना भी इतना ख़ूबसूरत हो सकता है।
सुप्रिया दूबे ©
