सुप्रिया दुबे Supriyaa Dubeyy
राग मल्हार
जब बादलों से झरती हैं बूँदें
पानी नहीं;
झरती हैं उलझनें, मेरे मन की,
ठंडी हवाओं की छुवन से
रोमांचित हो उठता है मेरा रोम-रोम,
वृक्षों की परछाईं-सा
झूमने लगता है मेरा मन,
और मेरी आत्मा करती है नृत्य
राग मल्हार की धुन पर!
© सुप्रिया दुबे
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