चौराहों पर
जब मैं देखती हूँ भीड़ को,
भीड़ मुझे दिखती है
किसी कहानी-संग्रह की भाँति,
जिसमें हर एक शख़्स
एक कहानी है;
एक चलती-फिरती कहानी,
जिस शख़्स की कहानी
दर्ज़ कर देता है कोई लेखक, काग़ज़ों पर,
मरने से बच जाती है वह कहानी,
बाकी की कहानियाँ रह जाती हैं अनकही
जो तोड़ देती हैं दम
अपने कथानायक के मरने के साथ ही,
एक शख़्स में
इतना लेखक तो होना चाहिए
कि वह लिख सके
कम से कम
अपनी कहानी!
~ सुप्रिया दुबे © (१८/०६/२०२०)
जब मैं देखती हूँ भीड़ को,
भीड़ मुझे दिखती है
किसी कहानी-संग्रह की भाँति,
जिसमें हर एक शख़्स
एक कहानी है;
एक चलती-फिरती कहानी,
जिस शख़्स की कहानी
दर्ज़ कर देता है कोई लेखक, काग़ज़ों पर,
मरने से बच जाती है वह कहानी,
बाकी की कहानियाँ रह जाती हैं अनकही
जो तोड़ देती हैं दम
अपने कथानायक के मरने के साथ ही,
एक शख़्स में
इतना लेखक तो होना चाहिए
कि वह लिख सके
कम से कम
अपनी कहानी!
~ सुप्रिया दुबे © (१८/०६/२०२०)
