आज तिन छट्ठी (हल छठ/हर छठ) का व्रत है। आज के दिन महिलाएँ अपनी संतान की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। मेरी अम्मा ने भी महुआ, दही, तिन्नी के चावल आदि सामानों की थाली सजा ली है। मुझे भी अम्मा के साथ छठ मईया की पूजा में जाना है। घर से थोड़ी दूरी पर ही एक शिवालय है, वहीं सब महिलाएँ पूजा के लिए इकट्ठी हो रही हैं। मैं बचपन से ही इस पूजा में शामिल होती आई हूँ। मुझे अच्छा लगता है महिलाओं का वो एक साथ सोहर गाना और वो महुआ के पत्ते पर दही और महुआ का प्रसाद।
आज भोर से ही मोहल्ले में काफी चहल-पहल है। महिलाएँ जल्दी-जल्दी अपने घर के काम ख़त्म कर रही हैं। कुछ घरों में तो भोजन बनाने की जिम्मेदारी भी आज लड़कियों की है। जो महिलाएँ हमेशा एक-दूसरे के घर में ताका-झाँकी करती थीं, वे सब भी आज एक साथ हँसते-बतियाते पूजा के लिए जा रही हैं। संतान की आयु बढ़ाने के साथ ही यह व्रत महिलाओं के बीच सौहार्द भी बढ़ाने वाला है।
अम्मा हमारी जल्दी-जल्दी तैयार हो रही हैं। बगल वाली चाची की लड़की "छोटी" सुबह से दो बार बुलाने आ चुकी है। बताती है कि चाची अम्मा के साथ ही पूजा करने जाएँगी। चाची इंतजार कर रही हैं यह जानकर हम जल्दी-जल्दी तैयार हो गए हैं। अम्मा ने पूजा की थाली उठा ली है और मैंने अपना बैग और मोबाइल क्योंकि वहीं से मुझे कॉलेज के लिए निकल जाना है।
अम्मा और चाची आगे-आगे बतियाते हुए चल रही हैं और मैं उनके पीछे-पीछे चलते हुए बिना उनको जताए उन्हें मोबाइल के कैमरे में कैद किए जा रही हूँ। हम अब पूजा स्थल पर पहुँच गए हैं। वहाँ पहले से ही मौजूद महिलाएँ सोहर गा रही हैं। पास के ही सरकारी नल पर अपने-अपने पैर धुलकर अम्मा और चाची भी पूजा करने लगी हैं। इस पूजा का भी अपना अलग विधान है। जमीन में कुश गाड़कर उसकी पूजा की जाती है। मैं पास ही खड़ी देख रही हूँ, महिलाएँ गीत गाते हुए कुश में गाँठ लगा रही हैं... फूल, महुआ, चावल आदि चढ़ा रही हैं। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं -
“छठिया ही छठिया बोलाईला...छठिया न बोले लिन हो...छठी माई कवने परासे तर लुकइलिन, बोलवले नाही बोले लिन हो?”
बड़ा मनमोहक लग रहा है यह दृश्य। मैं इन पलों को कैमरे में कैद करती जा रही हूँ। पूजा अब समाप्त हो चुकी है। अब अम्मा मुझे पास बुलाकर छठ मईया को प्रणाम करने के लिए कह रही हैं। मैंने प्रणाम कर लिया और अम्मा ने मेरे माथे पर एक टीका लगा दिया है। अब बारी है महुआ, दही और तिन्नी के चावल के प्रसाद की, जो महुआ के पत्तों पर दिया जाता है। मैंने प्रसाद ले लिया है और मंदिर में दर्शन आदि करने के बाद अब हम वापस लौट रहे हैं।
अम्मा और चाची तो घर निकल गईं हैं, वहीं मैं इन पलों को यादों में सजाते कॉलेज की ओर बढ़ चली हूँ। अब तो बस रात का इंतज़ार है जब तिन्नी का चावल और मरसा का साग खाने को मिलेगा।
© सुप्रिया दुबे
आज भोर से ही मोहल्ले में काफी चहल-पहल है। महिलाएँ जल्दी-जल्दी अपने घर के काम ख़त्म कर रही हैं। कुछ घरों में तो भोजन बनाने की जिम्मेदारी भी आज लड़कियों की है। जो महिलाएँ हमेशा एक-दूसरे के घर में ताका-झाँकी करती थीं, वे सब भी आज एक साथ हँसते-बतियाते पूजा के लिए जा रही हैं। संतान की आयु बढ़ाने के साथ ही यह व्रत महिलाओं के बीच सौहार्द भी बढ़ाने वाला है।
अम्मा हमारी जल्दी-जल्दी तैयार हो रही हैं। बगल वाली चाची की लड़की "छोटी" सुबह से दो बार बुलाने आ चुकी है। बताती है कि चाची अम्मा के साथ ही पूजा करने जाएँगी। चाची इंतजार कर रही हैं यह जानकर हम जल्दी-जल्दी तैयार हो गए हैं। अम्मा ने पूजा की थाली उठा ली है और मैंने अपना बैग और मोबाइल क्योंकि वहीं से मुझे कॉलेज के लिए निकल जाना है।
अम्मा और चाची आगे-आगे बतियाते हुए चल रही हैं और मैं उनके पीछे-पीछे चलते हुए बिना उनको जताए उन्हें मोबाइल के कैमरे में कैद किए जा रही हूँ। हम अब पूजा स्थल पर पहुँच गए हैं। वहाँ पहले से ही मौजूद महिलाएँ सोहर गा रही हैं। पास के ही सरकारी नल पर अपने-अपने पैर धुलकर अम्मा और चाची भी पूजा करने लगी हैं। इस पूजा का भी अपना अलग विधान है। जमीन में कुश गाड़कर उसकी पूजा की जाती है। मैं पास ही खड़ी देख रही हूँ, महिलाएँ गीत गाते हुए कुश में गाँठ लगा रही हैं... फूल, महुआ, चावल आदि चढ़ा रही हैं। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं -
“छठिया ही छठिया बोलाईला...छठिया न बोले लिन हो...छठी माई कवने परासे तर लुकइलिन, बोलवले नाही बोले लिन हो?”
बड़ा मनमोहक लग रहा है यह दृश्य। मैं इन पलों को कैमरे में कैद करती जा रही हूँ। पूजा अब समाप्त हो चुकी है। अब अम्मा मुझे पास बुलाकर छठ मईया को प्रणाम करने के लिए कह रही हैं। मैंने प्रणाम कर लिया और अम्मा ने मेरे माथे पर एक टीका लगा दिया है। अब बारी है महुआ, दही और तिन्नी के चावल के प्रसाद की, जो महुआ के पत्तों पर दिया जाता है। मैंने प्रसाद ले लिया है और मंदिर में दर्शन आदि करने के बाद अब हम वापस लौट रहे हैं।
अम्मा और चाची तो घर निकल गईं हैं, वहीं मैं इन पलों को यादों में सजाते कॉलेज की ओर बढ़ चली हूँ। अब तो बस रात का इंतज़ार है जब तिन्नी का चावल और मरसा का साग खाने को मिलेगा।
© सुप्रिया दुबे
