शौक बड़ी चीज है

मुझे बचपन से ही पेंटिंग्स का बहुत शौक रहा है। छोटी थी तो बहुत पेंटिंग बनाती थी, इधर 4-5 साल से सब बन्द था। ऐसा भी नहीं है कि तब बहुत समय था मेरे पास या अब समय नहीं रहता। कहीं न कहीं बड़े होते ही हम अपने शौक को समय देना बंद कर देते हैं। खुद को रोज-रोज के उन्हीं घिसे-पिटे कामों तक सीमित कर लेते हैं और परिणाम यह होता है कि हमारी जिंदगी कब नीरस हो जाती है, हमें पता भी नहीं चलता।

कल दोपहर ख़याल आया कि क्यों न इस शौक में दोबारा रंग भरा जाए!...फिर क्या! मैं निकल पड़ी उसी धूप में रंग, ब्रश और पेंटिंग के बाकी समान लाने। मुझे इस पेंटिंग के लिए एक्रेलिक कलर की जरूरत थी लेकिन यहाँ किसी दुकानदार ने पहले कभी एक्रेलिक कलर का नाम तक नहीं सुना था, नतीजतन मुझे पोस्टर कलर से ही काम चलाना पड़ा और जहाँ 10 या 12 नम्बर ब्रश की जरूरत थी वहाँ 3 और 5 नम्बर ब्रश का इस्तेमाल करना पड़ा।

मैंने कल दोपहर यह पेंटिंग बनानी शुरू की थी और पूरी होते-होते रात के 1 बज गए। मैंने बीच-बीच में ब्रेक भी लिया था और मैं ठहरी अभी नौसिखुआ इसलिए शायद कुछ ज़्यादा ही समय लग गया। ख़ैर, सीमित संसाधनों में ही सही, मेरा शौक पूरा हुआ।

कल जगह-जगह मंदिरों पर मेले लगे थे लेकिन मैं कहीं नहीं गई क्योंकि मुझे आज ही ये पेंटिंग पूरी करनी थी। अब जब यह बनकर तैयार है तो मुझे बहुत खुशी हो रही है। मैं सुबह से कई बार इसे देख चुकी हूँ... और जब-जब देख रही हूँ, चेहरे पर एक मुस्कान आ जा रही है।

तो इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
यही कि अगर हम खुश रहना चाहते हैं तो हमें शौक पाल लेने चाहिए, सीमित संसाधनों में ही सही, उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि जब शौक पूरे होते हैं तो बहुत खुशी मिलती है। मनोज वाजपेयी भी तो मानते हैं - "शौक बड़ी चीज है"

© सुप्रिया दुबे