अमरकांत, सुखदा, मुन्नी, नैना, सकीना...और भी न जाने कितने ही नाम जो मुझे उम्रभर याद रहने वाले हैं। इसे मुंशी प्रेमचंद की कलम का जादू ही कहिए जिसने इन काल्पनिक पात्रों को इतना सजीव बना दिया है। आजादी के पूर्व की सामाजिक समस्याओं, ऊँच-नीच, वर्गभेद के विकराल संघर्षों, आंदोलनों, स्त्री-पुरुष की मनो व्यथा, पारिवारिक जीवन और समय के साथ मानव-स्वभाव में होने वाले परिवर्तनों को कड़ी-दर-कड़ी अपने में सँजोए हुए चलता है प्रेमचन्द का उपन्यास - ‘कर्मभूमि’।
इसे पढ़ने में मुझे काफी समय लग गया। ऐसा इसलिए क्योंकि एक तो यह मेरे सिलेबस का हिस्सा है और दूजे इसकी कहानी थोड़ी लम्बी है। कुल मिलाकर इसे पढ़ने के लिए थोड़े धैर्य की आवश्यकता पड़ती है।
इसे पढ़ने में मुझे काफी समय लग गया। ऐसा इसलिए क्योंकि एक तो यह मेरे सिलेबस का हिस्सा है और दूजे इसकी कहानी थोड़ी लम्बी है। कुल मिलाकर इसे पढ़ने के लिए थोड़े धैर्य की आवश्यकता पड़ती है।
