बहुत कम ही स्कूल गई हूँ। मैंने ज़्यादातर स्वाध्याय से ही पढ़ाई की है। ऐसे में सच्चे गुरु के रूप में मेरी आँखों के सामने बस तीन गुरुजनों की ही छवि आती है। एक तो हमारे विजय सर...जिन्होंने हमें 9वीं से 12वीं तक इंग्लिश पढ़ाया। दूसरे अवधेश सर...जिनसे मैंने 9वीं और 10वीं में गणित और विज्ञान पढ़ा। विजय सर और अवधेश सर से हमने केवल ये विषय ही नहीं पढ़ा बल्कि मेहनत करना भी सीखा। कैसे पढ़ा सकता है कोई इतने 'डेडीकेशन' से आज के समय में!
इनका ये अहसान मैं जीवन भर नहीं उतार पाऊँगी। 8वीं तक तो मुझे इतना भी नहीं पता था कि "Tense" होते कितने हैं। आज मैं "इंग्लिश" पढ़ना, लिखना और बोलना सीख पाई तो वो विजय सर की बदौलत।
गणित से मैं इतना डरती थी कि कभी दीदी-भैया के सामने गणित पढ़ने नहीं बैठती थी कि कहीं कोई सवाल न पूछ लें...लेकिन अवधेश सर ने ऐसा पढ़ाया कि गणित और विज्ञान एकदम खेल जैसे लगने लगे।
न्यू ईयर पर मेरी विजय सर से बात हुई थी। बात बहुत थोड़ी देर के लिए ही हो पाई क्योंकि सर को 9वीं की क्लास लेनी थी...लेकिन उन्होंने जो भरोसा दिखाया मुझ पर उससे मुझे खुदपर और भी भरोसा हो गया। आज मैंने सर से बात नहीं की, ऐसा नहीं है कि मुझे याद नहीं आई...लेकिन पता नहीं क्यों! दरअसल मैं बातों में कम और काम में ज़्यादा विश्वास रखती हूँ, शायद इसीलिए। अब बस सर के भरोसे को टूटने नहीं देना है... अपने और उनके सपने को सच कर के दिखाना है। बाकी बहुत कुछ सोच रखा है "फ्यूचर" के लिए...कि सर के लिए ये-ये करना है। मुझे पता है कि मैं कुछ भी कर लूँ उनका अहसान कभी नहीं उतार पाऊँगी लेकिन मुझे खुशी मिलेगी...
मैंने सोच रखा है... अब अचानक से ही हमें भाग्य अगर न मिला दे तो मैं तब तक उनसे मिलने नहीं जाऊँगी जब तक उनके सपने को सच नहीं कर लेती। अब बस विजय सर और अवधेश सर को खुश देखना है। इन दोनों गुरुजनों को मैं आख़िरी साँस तक नहीं भूल सकती।
और तीसरे हमारे संस्कृत के गुरु जी ( श्री विजय कृष्ण ओझा गुरु जी)...जिनसे मैं अभी संस्कृत पढ़ रही हूँ। मैं गुरु जी का कभी नाम नहीं लेती, ये बस आपको बताने के लिए लिख दिया। गुरु जी हमें बिल्कुल निःस्वार्थ भाव से पढ़ाते हैं। जब गुरु जी हमें "बच्चा" कहते हैं तो बहुत अपनापन सा लगता है। गुरु जी बिल्कुल मेरे पापा के जैसे लगते हैं। जिनका मैं बहुत सम्मान करती हूँ। मैं आजीवन उनकी ऋणी रहूँगी।
यूँ तो और भी अध्यापक मिले हैं मुझे जीवन में, जिन सबका मैं सम्मान करती हूँ...लेकिन स्पष्टरूप से कहूँ तो ये तीन गुरु मेरे जीवन में बहुत ख़ास हैं, जिन्हें मैं श्रद्धापूर्वक याद करती हूँ।
बहुत कुछ सोच रखा है मैंने आप तीनों के लिए जो कि एक "सीक्रेट" है...आप लोगों को भी नहीं बता सकती।
ईश्वर से आप तीनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना करती हूँ....
सभी को शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ...
© सुप्रिया दुबे
इनका ये अहसान मैं जीवन भर नहीं उतार पाऊँगी। 8वीं तक तो मुझे इतना भी नहीं पता था कि "Tense" होते कितने हैं। आज मैं "इंग्लिश" पढ़ना, लिखना और बोलना सीख पाई तो वो विजय सर की बदौलत।
गणित से मैं इतना डरती थी कि कभी दीदी-भैया के सामने गणित पढ़ने नहीं बैठती थी कि कहीं कोई सवाल न पूछ लें...लेकिन अवधेश सर ने ऐसा पढ़ाया कि गणित और विज्ञान एकदम खेल जैसे लगने लगे।
न्यू ईयर पर मेरी विजय सर से बात हुई थी। बात बहुत थोड़ी देर के लिए ही हो पाई क्योंकि सर को 9वीं की क्लास लेनी थी...लेकिन उन्होंने जो भरोसा दिखाया मुझ पर उससे मुझे खुदपर और भी भरोसा हो गया। आज मैंने सर से बात नहीं की, ऐसा नहीं है कि मुझे याद नहीं आई...लेकिन पता नहीं क्यों! दरअसल मैं बातों में कम और काम में ज़्यादा विश्वास रखती हूँ, शायद इसीलिए। अब बस सर के भरोसे को टूटने नहीं देना है... अपने और उनके सपने को सच कर के दिखाना है। बाकी बहुत कुछ सोच रखा है "फ्यूचर" के लिए...कि सर के लिए ये-ये करना है। मुझे पता है कि मैं कुछ भी कर लूँ उनका अहसान कभी नहीं उतार पाऊँगी लेकिन मुझे खुशी मिलेगी...
मैंने सोच रखा है... अब अचानक से ही हमें भाग्य अगर न मिला दे तो मैं तब तक उनसे मिलने नहीं जाऊँगी जब तक उनके सपने को सच नहीं कर लेती। अब बस विजय सर और अवधेश सर को खुश देखना है। इन दोनों गुरुजनों को मैं आख़िरी साँस तक नहीं भूल सकती।
और तीसरे हमारे संस्कृत के गुरु जी ( श्री विजय कृष्ण ओझा गुरु जी)...जिनसे मैं अभी संस्कृत पढ़ रही हूँ। मैं गुरु जी का कभी नाम नहीं लेती, ये बस आपको बताने के लिए लिख दिया। गुरु जी हमें बिल्कुल निःस्वार्थ भाव से पढ़ाते हैं। जब गुरु जी हमें "बच्चा" कहते हैं तो बहुत अपनापन सा लगता है। गुरु जी बिल्कुल मेरे पापा के जैसे लगते हैं। जिनका मैं बहुत सम्मान करती हूँ। मैं आजीवन उनकी ऋणी रहूँगी।
यूँ तो और भी अध्यापक मिले हैं मुझे जीवन में, जिन सबका मैं सम्मान करती हूँ...लेकिन स्पष्टरूप से कहूँ तो ये तीन गुरु मेरे जीवन में बहुत ख़ास हैं, जिन्हें मैं श्रद्धापूर्वक याद करती हूँ।
बहुत कुछ सोच रखा है मैंने आप तीनों के लिए जो कि एक "सीक्रेट" है...आप लोगों को भी नहीं बता सकती।
ईश्वर से आप तीनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना करती हूँ....
सभी को शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ...
© सुप्रिया दुबे
