मैं उसमें मिल जाऊँगी!

वो है गंभीर समन्दर;
मैं हूँ इक नदिया चंचल,
वो मचल रहा
मुझसे मिलने को प्रतिपल,
करता हुआ अथक प्रयास
मुझसे मिलने का;

उसकी सीमाएँ उसे रोके रखी हैं,
मजबूर है वह
अपने ही विस्तार से,
विरह की अग्नि में
उसके होठों के किनारे भी
पड़ गए हैं काले,
फट गए हैं होंठ उसके
अश्रु के खारेपन से;

है ज्ञात मुझे
उससे मिल मैं खो दूँगी
अपना भी अस्तित्व,
मगर वो तड़प रहा
मुझसे मिलने को ही,
यही सोच
मैं हर बार बढ़ा देती हूँ
अपनी रफ्तार थोड़ा और;

मैं बह रही हूँ अनवरत,
बाधाओं को पार करते हुए,
गर आ जाए कहीं कुछ सामने
बह जाता है वह भी,
मेरे इस वेग में;

हूँ अभी अवसादग्रस्त मैं,
है ज्ञात मुझे,
गुम हो जाएगा मेरा अवसाद
उससे मिलते ही,
उसमें ही कहीं;

मैं उससे मिलूँगी ही नहीं
मैं उसमें मिल जाऊँगी!

-- सुप्रिया दूबे ©