जो मिल जाए मुझे
रेगिस्तान में पानी सरीखे
जिसे देखते ही दिल कहे
यही है वो जिसकी तलाश थी मुझे
जो ला दे मुस्कुराहट मेरे चेहरे पे यूँ ही खामखां
और समझे मुझे मुझसे भी जादा
जो करे निर्धारित पूरे अधिकार से
कि रंग कौन-सा फबता है मुझ पे सबसे जादा
हो जिसे तलाश मुझ-सी ही किसी की
उस ‛अनुरागी’ की तलाश है मुझे
एक हमसफ़र की तलाश है मुझे...
हो राम का सा तेज
और कृष्ण सी चंचलता जिसमें
जिसके साथ मैं होऊँ बनारस
और बिछड़ते ही मुम्बई-सी
जो सुने मेरी बकवास बातें भी बड़े चाव से
करे जो बड़ों का सम्मान आदरभाव से
जो खूबियों से अधिक मेरी कमियाँ बताए
एक हमसफ़र से भी अधिक
फर्ज़ एक गुरु का निभाए
सात जन्मों तक नहीं तो ना सही
मगर साथ इस जनम में पूरी निष्ठा से निभाए
खिल उठें कलियाँ जब वो मुस्कुराए
जिसकी मासूम आँखें ही राज उसके बताएँ
उस ‛माशूक़’ की तलाश है मुझे
वो ले रहा होगा साँसे कहीं पर
विश्वास है मुझे
एक हमसफ़र की तलाश है मुझे...
~ सुप्रिया दूबे ©