तेरे दिल में जरा गहरी उतर गई हूँ मैं;
हाँ, शायद तुझको भा गई हूँ मैं,
तेरी आँखें कुछ दिनों से पढ़ रही हूँ मैं,
जो मुझे दिख रहा है इनमें,
कहीं यह प्रेम तो नहीं!
तुम्हें खबर हो!
रातों में भी जगते हो देर तक;
तुम्हें जगने का शौक है
कि मैं सोने नहीं देती?
कहीं यह प्रेम तो नहीं!
तुम्हें खबर हो!
न खाने की सुध है, न पीने की;
कुछ तो बात है जो अब,
तुम बदले से नज़र आते हो;
खोये रहते हो हरदम ख़यालों में,
कहीं यह प्रेम तो नहीं!
तुम्हें ख़बर हो!
बिना किसी बात के हरदम,
यूँ मुस्कुराते हो;
आजकल तुम मुझसे ही बातें छुपाते हो,
न देखो थोड़ी देर मुझको
तो सहम जाते हो;
कहीं यह प्रेम तो नहीं!
तुम्हें ख़बर हो!
~ सुप्रिया दूबे ©