दिनभर की भागदौड़ के बाद,
आती है सुकून भरी रात;
जब सो रहे होते हैं सारे लोग,
तो मैं जग रही होती हूँ,
कुछ किरकिच्चियों के साथ;
और फिर उमड़ते हैं कुछ ख़याल,
मेरे ज़ेहन में,
मैं प्रयास करने लगती हूँ,
अपनी भावनाओं को शब्द देने का;
सुबह तक विस्मृत न हो जाएँ ये ख़याल!
रात के दो बजे सबसे छुपते हुए,
धीरे से उठकर मैं,
खोजने लगती हूँ एक कलम और कोई कॉपी,
जो मिल जाती है मुझे किसी कोने से;
और फिर रात के उस सन्नाटे में,
घड़ी की सुइयों और
किरकिच्चियों की आवाज की ताल पर,
जन्म लेती है एक कविता...!!
-- सुप्रिया दूबे ©