हरियाणा के एक छोटे से गाँव 'खेड़ी' से निकली एक लड़की 'अनु' अगर अकेले निकल सकती है दुनिया देखने तो हम क्यों नहीं?
जी हाँ! 'आज़ादी मेरा ब्रांड' नामक यह क़िताब पढ़ते हुए यही सवाल ज़ेहन में आता है। अनुराधा बेनीवाल की लिखी इस क़िताब से मुझे तो इश्क़ हो गया है। इसमें ऐसी बहुत सी बातें हैं जो आपके दिल को छू जाएँगी तो बहुत सम्भव है कुछ चीजों से आप सहमत ना हो पाएँ। लेकिन यकीन मानिए यह किताब मोहब्बत है। लेखिका ने यूरोप के १० देशों में की गई घुमक्कड़ी को एक यात्रावृत्तांत का रूप दे दिया है। 'यायावरी आवारगी' श्रृंखला की यह पहली क़िताब है.. अगले पड़ाव का मुझे बेसब्री से इंतज़ार है। घर बैठे दुनिया को जान सकते हैं आप इस क़िताब से।
क़िताब की शुरुआत में एक जगह अनुराधा लिखती हैं कि लड़कों को हम अक्सर कहते सुनते हैं कि "ज़रा हवा खा के आता हूँ" या "ज़रा बाहर घूम के आता हूँ"...लेकिन कभी किसी लड़की को शायद ही ऐसा कहते सुना होगा। हमारे देश में लड़कियाँ बिना किसी काम के यूँ बाहर हवा खाने नहीं निकलतीं।...और ये बात मेरे दिल पर लग गई। उसी शाम मैंने दीदी से कहा "दीदी चलो ना थोड़ा हवा खा के आते हैं"। अँधेरा हो गया था। हम निकल पड़े बेमतलब... बस हवा खाने। हमारे चेहरे पर एक खुशी थी...आज़ादी की खुशी...जो घर में बैठे रह के हमें कभी नहीं मिल सकती। हमें बाहर निकलना होगा। इस समाज से लड़ के। ख़ुद पे भरोसा रखते हुए। अभी सुनकर विश्वास नहीं हो शायद.. कि कोई लड़की अकेले भी किसी अनजान देश में बेफ़िक्र घूम सकती है वो भी कम पैसों में.. लेकिन 'हिंदी भाषा' में लिखी यह किताब आपको यकीन दिलाएगी कि ऐसा संभव है... और ऐसा पहले भी किया जा चुका है।
जरूर पढ़िए।
लड़कियाँ तो ख़ासकर पढ़ें।
जी हाँ! 'आज़ादी मेरा ब्रांड' नामक यह क़िताब पढ़ते हुए यही सवाल ज़ेहन में आता है। अनुराधा बेनीवाल की लिखी इस क़िताब से मुझे तो इश्क़ हो गया है। इसमें ऐसी बहुत सी बातें हैं जो आपके दिल को छू जाएँगी तो बहुत सम्भव है कुछ चीजों से आप सहमत ना हो पाएँ। लेकिन यकीन मानिए यह किताब मोहब्बत है। लेखिका ने यूरोप के १० देशों में की गई घुमक्कड़ी को एक यात्रावृत्तांत का रूप दे दिया है। 'यायावरी आवारगी' श्रृंखला की यह पहली क़िताब है.. अगले पड़ाव का मुझे बेसब्री से इंतज़ार है। घर बैठे दुनिया को जान सकते हैं आप इस क़िताब से।
क़िताब की शुरुआत में एक जगह अनुराधा लिखती हैं कि लड़कों को हम अक्सर कहते सुनते हैं कि "ज़रा हवा खा के आता हूँ" या "ज़रा बाहर घूम के आता हूँ"...लेकिन कभी किसी लड़की को शायद ही ऐसा कहते सुना होगा। हमारे देश में लड़कियाँ बिना किसी काम के यूँ बाहर हवा खाने नहीं निकलतीं।...और ये बात मेरे दिल पर लग गई। उसी शाम मैंने दीदी से कहा "दीदी चलो ना थोड़ा हवा खा के आते हैं"। अँधेरा हो गया था। हम निकल पड़े बेमतलब... बस हवा खाने। हमारे चेहरे पर एक खुशी थी...आज़ादी की खुशी...जो घर में बैठे रह के हमें कभी नहीं मिल सकती। हमें बाहर निकलना होगा। इस समाज से लड़ के। ख़ुद पे भरोसा रखते हुए। अभी सुनकर विश्वास नहीं हो शायद.. कि कोई लड़की अकेले भी किसी अनजान देश में बेफ़िक्र घूम सकती है वो भी कम पैसों में.. लेकिन 'हिंदी भाषा' में लिखी यह किताब आपको यकीन दिलाएगी कि ऐसा संभव है... और ऐसा पहले भी किया जा चुका है।
जरूर पढ़िए।
लड़कियाँ तो ख़ासकर पढ़ें।
~ सुप्रिया दुबे ©
