संस्कृतम् (संस्कृत-सम्भाषण-शिविर)

इन दिनों हमारे महाविद्यालय में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान से तीन आचार्य आए हुए हैं जो हमें संस्कृत सम्भाषण सिखा रहे हैं। उनका यह मानना है कि यदि इन २० दिनों में हम नियमित रहे तो वे हमें संस्कृत में वार्तालाप करना सिखा देंगे। आज कक्षा के लगभग १४-१५ दिन हो रहे हैं और वाकई हम संस्कृत में  सहज सम्भाषण करने लगे हैं। हमें सिखाने वाले आचार्यों में से एक २९-३० वर्षीय युवा हैं जो कि नेपाल के मूल निवासी हैं। वे इतनी शुद्ध हिंदी बोलते हैं कि सुनकर आश्चर्य होता है। वे बताते हैं कि उन्हें नेपाली, संस्कृत और हिंदी के अलावा अंग्रेजी और भोजपुरी भाषाएँ भी आती हैं। उन्हें देखकर लगता ही नहीं है कि वे भारतीय नहीं हैं। चेहरे पर तेज, माथे पर तिलक, सिर पर शिखा लिए वे सज्जन कुर्ते में एक आदर्श भारतीय लगते हैं। स्वाभाविक भी है, आख़िर एक समय नेपाल भारत का ही हिस्सा रहा है।

एक अन्य देश के नागरिक होते हुए भी वे भारतीय भाषाओं के प्रति इस प्रकार प्रेम रखते हैं कि इनके प्रचार-प्रसार और संवर्धन के लिए उन्होंने अपना देश तक छोड़ दिया है और वहीं हम इन्हें बोलने में भी लज्जा का अनुभव करते हैं। हमें उनसे सीखना चाहिए। वे संस्कृत का गुणगान करते नहीं थकते क्योंकि उन्हें संस्कृत का महात्म्य पता है।

दूसरे आचार्य भी कोई २७-२८ वर्ष के होंगे। कितनी धाराप्रवाह संस्कृत बोलते हैं वे! काफी हँसमुख हैं। हमें खूब हँसाते हैं। तीसरे आचार्य थोड़े उम्रदराज हैं। उम्र होगी कोई ४०-४५ वर्ष के करीब। उनकी आवाज थोड़ी धीमी है किन्तु पढ़ाते अच्छा हैं।

कक्षा में बोलने की पूर्ण स्वतंत्रता है। प्रथम दिन नेपाल से आए आचार्य ने जब सभी से संस्कृत पढ़ने के पीछे का कारण पूछा तो सारी कक्षा शांत हो गयी। लोग बस पढ़ रहे हैं, उन्हें पता नहीं है कि क्यों पढ़ रहे हैं। असल में उनकी भी गलती नहीं है। संस्कृत और हिंदी विषय मात्र न होकर भारतीय भाषाएँ भी हैं जिनका महात्म्य इतना अधिक है कि इन्हें किसी दायरे में नहीं बाँधा जा सकता। जब मैंने बताया कि मैं संस्कृत इसलिए पढ़ रही हूँ ताकि संस्कृत का संवर्धन हो सके, अपनी विलुप्त होती संस्कृति को संरक्षित किया जा सके तो आचार्य काफी प्रसन्न हुए।

वास्तव में स्नातक में मेरे द्वारा संस्कृत का चुनाव करने के पीछे यही कारण था। मुझे १२ वीं तक अंग्रेजी भाषा से बड़ा लगाव था। अंग्रेजी मेरा पसंदीदा विषय था लेकिन जब स्नातक में विषय चुनने की बात आयी तो मैंने हिंदी और संस्कृत को चुना। उस समय मुझे नहीं पता था कि संस्कृत में कोई भविष्य है भी या नहीं लेकिन मैंने संस्कृत चुना क्योंकि मैं संस्कृत भाषा के संरक्षण में भागीदार बनना चाहती थी और संयोगवश मुझे एक विद्वान गुरु का सानिध्य भी मिल गया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हमारी स्नातक द्वितीय वर्ष की संस्कृत की कक्षा में मात्र ६ विद्यार्थी हैं जिनमें ३ लड़के हैं और ३ लड़कियाँ हैं। वहीं अंग्रेजी और अन्य विषयों की कक्षाएँ खचाखच भरी रहती हैं। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि इतनी बड़ी कक्षा में मैं बस अकेले ही पढ़ती हूँ। यह एक विडंबना ही है कि जिस भाषा से अन्य भाषाओं की उत्पत्ति हुई वही भाषा आज अपने ही देश में उपेक्षित है। कारण यह है कि कोई भी पहल करने से पहले ही हम यह सोच लेते हैं कि एक हमारे ही करने से क्या हो जाएगा? लेकिन वहीं हम यह कहावत भूल जाते हैं कि “बूँद-बूँद से ही सागर बनता है”। मैं यह नहीं कहती हूँ कि आप अन्य देशों की भाषाएँ न सीखिए लेकिन पहली प्राथमिकता अपने देश की भाषाओं को दीजिए।

हमारा देश कल भी विश्वगुरु था और आज भी विश्व गुरु है। हमारे देश में ज्ञान का भंडार है जो अधिकांशतः संस्कृत में है जिसे समझने के लिए हमारा संस्कृत सीखना अति आवश्यक है। हमारे महाविद्यालय के संस्कृत विभाग में ऋषि-मुनियों द्वारा लिखित ऐसे-ऐसे श्लोक लगे हुए हैं जिन्हें चुराकर आज दुनिया वैज्ञानिकता की जनक बनी फिर रही है और वहीं चिराग तले ही अंधकार व्याप्त है।

प्राचीन काल में विज्ञान, ज्योतिष, अंतरिक्ष विज्ञान, आयुर्वेद, चिकित्सा, गणित हर एक क्षेत्र में हमारा देश आगे था। ऐसे पुष्पक विमान थे जो हमारे मन द्वारा संचालित होते थे। दुनिया ने बताया और हमने मान लिया कि परमाणु बम का सबसे पहला प्रयोग हिरोशिमा और नागाशाकी में किया गया जबकि इसका का सर्वप्रथम प्रयोग महाभारत के युद्ध में हुआ था, ऐसा प्रमाण मिलता है। गुरुत्वाकर्षण की खोज न्यूटन ने नहीं बल्कि कणाद ऋषि ने की थी और यह बात खुद विदेशों के वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं। इसके अलावा ऐसे बहुत से आविष्कार और खोज हैं जो हमारे भारत की देन हैं लेकिन हम उन्हें पश्चिमी सभ्यता की देन मानते हैं।

प्राचीन भारत में गुरुकुल आदि में कॉपी-कलम ले जाने की मन्हाई होती थी। छात्रों को पूरी की पूरी पुस्तकें कंठस्थ हो जाती थीं। कैसे? हमें इसके पीछे का कारण समझना होगा। इसका सबसे प्रमुख कारण यह था कि तब हम अपने भीतर देखते थे, ध्यान और योग करते थे जिसके परिणामस्वरूप हममें अलौकिक गुणों का विकास होता था। दूर घटित हो रही कोई घटना हम आँख मूँद कर ही देख सकते थे। उस समय हमारी याद्दाश्त तेज होती थी लेकिन आज हम पहले की अपेक्षा पीछे हैं क्योंकि हमने अपने भीतर देखना बन्द कर दिया है। अब हम बाहर की दुनिया ही देखते रह जाते हैं। सोशल मीडिया से हमें फुर्सत ही नहीं मिलती कि हम अपने अंदर झाँक सकें।

चलिए ठीक है प्रयोग किया जाए सोशल मीडिया का, आज के समय में उचित भी है, किन्तु तनिक उसी का उपयोग अपने देश की सभ्यता-संस्कृति को जानने, संस्कृत को समझने और सीखने में भी किया जाना चाहिए क्योंकि संस्कृत एक भाषा ही नहीं हमारी सभ्यता भी है जो हमें हमसे मिलाती है, हमें अपने अंदर झाँकना सिखाती है। मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूँ कि मुझे संस्कृत सीखने का अवसर मिला। मैं शुरू से ही किसी अच्छे गुरू से संस्कृत सीखना चाहती थी और आज भगवान ने मुझे यह अवसर दे दिया क्योंकि जब हम किसी चीज को पूरे दिल से चाहते हैं तो वो एक न एक दिन हमें मिल ही जाती है इसलिए आप भाग्य को दोष देना बंद करिए कि मुझे सीखने का अवसर ही नहीं मिल पाया, फलाना ढिमका। यदि आपके मन में संस्कृत के प्रति निष्ठा आ गयी तो आप इसे सीखने का रास्ता खुद ही बना लेंगे।

आज जब विश्व के ३०० सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की गणना हुई तो उसमें से एक भी विश्वविद्यालय भारत का नहीं था, क्यों? क्योंकि हमारी भाषा अंग्रेजी नहीं है लेकिन हमें अंग्रेजी में पढ़ाया जा रहा है, हम खुद भी अंग्रेजी बोलने में गौरव का अनुभव कर रहे हैं जबकि अन्य देशों में संस्कृत पढ़ाई जा रही है, हिंदी पढ़ाई जा रही है। हम हिंदी और संस्कृत में ज़्यादा बेहतर कर पाएँगे, सरकार को यह समझना होगा। सरकार को जगह-जगह संस्कृत मीडियम स्कूल और विश्वविद्यालय खोलने होंगे। फिर देखिए भारत कैसे पीछे रहता है।

दयाननद सरस्वती ने बहुत पहले ही यह बात समझ ली थी कि बिना संस्कृत के देश का विकास सम्भव नहीं है। उन्होंने नारा दिया कि “वेदों की ओर लौटो”। कैसे लौटेंगे भई? उसके लिए तो संस्कृत सीखनी पड़ेगी ना? यहाँ हमें सहज संस्कृत बोलने भी नहीं आ रहा तो हम वेदों को कैसे समझ पाएँगे? इतनी आसान भाषा तो है नहीं वेदों की। तो भईया! क्यों ना संस्कृत सीखा जाए? तनिक आप ही सोचिए कितने पुण्य कर्मों के बाद तो मानव जीवन मिला है वो भी रेत की तरह फिसलता जा रहा है। अगर जीवन में हम बिना वेदों को पढ़े ही मर गए, बिना अपने भारत को समझे ही दुनिया से विदा हो गए तो क्या शान्ति मिल पाएगी हमारी आत्मा को? हम संतुष्टि से मर पाएँगे?


इसलिए आज आवश्यकता है कि संस्कृत को बढ़ावा दिया जाए। हालाँकि जबसे केंद्र में भाजपा और उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनी है तबसे संस्कृत को बढ़ावा मिल रहा है। नवोदय विद्यालयों और स्कूलों, कॉलेजों में "संस्कृत भारती" व "उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान" के तहत भी निःशुल्क संस्कृत सम्भाषण शिविर लगाए जा रहे हैं। पुस्तकें बाँटी जा रही हैं। लोगों के मन में संस्कृत सीखने की उत्सुकता बढ़ रही है। फिर भी जो इस सुविधा से वंचित हैं अथवा जो अब विद्यार्थी जीवन से बाहर निकल चुके हैं, उन्हें संस्कृत सीखने के लिए खुद जागरुक होना होगा।

अभी ६-७ वर्ष पहले की ही बात है, दक्षिण भारत में एक जगह वर्षा नहीं हो रही थी, वहाँ विधि-विधान से एक यज्ञ किया गया। वहाँ के लोग बताते हैं कि आसमान में बादलों का कहीं नामो-निशान नहीं था और देखते ही देखते इतने बादल इकट्ठे हो गए कि कुछ दिनों तक लगातार वर्षा होती रही। कैसे? संस्कृत मंत्रोच्चारण के ही फलस्वरूप तो!

माना जाता है कि संस्कृत जहाँ भी बोली जाती है वहाँ आस-पास का वातावरण शुद्ध और सकारात्मक हो जाता है। संस्कृत बोलने वाले का मन शांत और स्वस्थ रहता है। संस्कृत बोलने से शरीर में ऐसी तरंगे उत्पन्न होती हैं जो हमें रोगों से दूर रखती हैं। ऐसा शोध हुआ है कि संस्कृत बोलने मात्र से कैंसर जैसी भयानक बीमारी दूर रहती है।

एक दिन नेपाल से आए आचार्य हमें बता रहे थे कि जब वे छोटे थे, वे स्पष्ट नहीं बोल पाते थे। कई डॉक्टरों को दिखाया गया लेकिन कोई लाभ नहीं मिल पा रहा था। तब एक व्यक्ति ने सुझाव दिया कि आप संस्कृत के वर्णों का उच्चारण कीजिए। धीरे-धीरे उनमें संस्कृत के प्रति श्रद्धा बढ़ती गई और संस्कृत बोलने मात्र से अब वे एकदम स्पष्ट रूप से बोल पाते हैं।

इसी प्रकार संस्कृत की चमत्कारिकता और वैज्ञानिकता के बहुत से उदाहरण आपको मिल जाएँगे। आज समाज में इस प्रकार नैतिकता का अभाव होता जा रहा है। हर तरफ बलात्कार, हत्या, भ्रष्टाचार, स्वार्थपूर्ण घटनाएँ घटित हो रही हैं। ऐसे में समाज को सभ्य बनाने के लिए हमारा संस्कृत की ओर लौटना अति आवश्यक हो गया है। दुनिया के सभी देश इस बात को समझ रहे हैं, भारत भी इस बात को जितनी जल्दी समझ ले उतना ही अच्छा होगा।

 -  सुप्रिया दुबे © (२४/९/२०१९)